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आदिवासी महा दरबार: चम्पाई सोरेन ने हेमंत सरकार पर साधा निशाना, दान पत्र से लूटी जमीन वापस दिलवाने का ऐलान

जमशेदपुर : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने आदिवासी समुदाय के हितों की रक्षा के लिए आंदोलन छेड़ने का ऐलान किया है। स्थानीय एक्सएलआरआई ऑडिटोरियम में आयोजित आदिवासी महा दरबार को संबोधित करते हुए उन्होंने वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार पर पेसा (पंचायत विस्तार अधिनियम) लागू न करने का आरोप लगाया। सोरेन ने कहा कि सरकार आदिवासियों की जमीनों पर अतिक्रमण रोकने में नाकाम रही है और टाटा समूह जैसे औद्योगिक घरानों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही।

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पेसा अधिनियम पर सरकार की उदासीनता

चम्पाई सोरेन ने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने पेसा अधिनियम की समीक्षा की थी और पारंपरिक ग्राम सभाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए विशेष प्रावधान जोड़े थे। लेकिन वर्तमान सरकार में इस कानून को लागू करने की कोई इच्छाशक्ति नहीं दिख रही। उन्होंने कहा, “सरकार आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को मजबूत नहीं बनाना चाहती। उनका उद्देश्य आदिवासियों को ‘अबुआ-अबुआ’ (हमारा-हमारा) के नारे में उलझाकर रखना है, ताकि वे सवाल न उठा सकें।”

सोरेन ने आदिवासियों को जमीन के मालिक बताते हुए कहा कि यदि जमीन सुरक्षित रहे और सिंचाई की व्यवस्था हो, तो एक आदिवासी परिवार 10 परिवारों को खिलाने की क्षमता रखता है। उन्होंने चेतावनी दी कि कुछ लोग आदिवासियों को अनुदान और राशन के चावल पर निर्भर बनाए रखना चाहते हैं।

दान पत्र और जमीन लूट का मुद्दा

कार्यक्रम में सोरेन ने दान पत्र के माध्यम से आदिवासी जमीनों की लूट पर जोरदार प्रहार किया। उन्होंने कहा कि पहले महाजनी व्यवस्था से जमीनें गंवाई जाती थीं, अब वही काम दान पत्र के जरिए हो रहा है। सीएनटी-एसपीटी एक्ट को बायपास करने के लिए लोग एक कागज के टुकड़े का सहारा ले रहे हैं। विशेष रूप से भोगनाडीह गांव का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि वीर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के गांव में अब 250 परिवार घुसपैठिए बस चुके हैं, जबकि आदिवासी परिवार घटकर 100 से भी कम रह गए हैं।

सोरेन ने साहिबगंज, दुमका, रांची, लोहरदगा और कपाली जैसे क्षेत्रों में जमीन लूट का जिक्र किया। कपाली के बांधगोड़ा में सैकड़ों एकड़ जमीन पर अतिक्रमण का आरोप लगाते हुए पूछा, “यह गोरखधंधा किसके संरक्षण में चल रहा है?” उन्होंने 22 दिसंबर को भोगनाडीह में एक बड़ी ‘बैसी’ (पारंपरिक बैठक) बुलाने का ऐलान किया, जिसमें दान पत्र से लूटी गई जमीनों को वापस दिलवाने का निर्णय लिया जाएगा।

औद्योगिक घरानों पर हमला

पूर्व सीएम ने टाटा समूह पर निशाना साधते हुए कहा कि झारखंड से लेकर ओडिशा तक आदिवासी जमीनों पर हजारों हेक्टेयर कब्जा किया गया है, लेकिन बदले में समुदाय को कुछ नहीं मिला। उन्होंने कहा, “आदिवासियों की पुश्तैनी जमीन पर बिना अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी किए कारखाने लगाए जा रहे हैं।” सोरेन ने कोल्हान, संथाल आदि जिलों में छावनी जैसे हालात का जिक्र करते हुए विश्व आदिवासी दिवस पर नगड़ी ग्राम में हल जोतने की घटना को अपनी जीत बताया।

ऐतिहासिक संघर्ष और सांस्कृतिक संरक्षण

सोरेन ने बाबा तिलका मांझी, वीर सिदो-कान्हू, पोटो हो, चांद-भैरव और भगवान बिरसा मुंडा जैसे नायकों का स्मरण किया, जो जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ चुके हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासियों को अपनी परंपरा और संस्कृति बचाने के लिए आगे आना होगा। इसके अलावा, उन्होंने आरक्षण के दुरुपयोग पर चिंता जताई। यदि कोई आदिवासी महिला गैर-आदिवासी से विवाह कर लेती है, तो जाति प्रमाण पत्र के आधार पर आरक्षण का लाभ लेना उचित नहीं। इसी तरह, जीवनशैली छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने वालों को भी आरक्षण से वंचित किया जाना चाहिए।

उन्होंने अपने कार्यकाल में सरकारी स्कूलों में स्थानीय/आदिवासी भाषाओं में शिक्षा शुरू करने के प्रयास का जिक्र किया, जो सरकार बदलने के बाद रुक गया। मरांग बुरू जैसे पवित्र स्थलों को विवादों में घसीटने का भी आरोप लगाया।

अन्य वक्ताओं के विचार

आदिवासी महा दरबार में इनकम टैक्स की एडिशनल कमिश्नर और पंचायती राज विभाग की पूर्व निदेशक निशा उरांव ने पेसा अधिनियम, अनुसूचित जनजातियों के अधिकार, रूढ़ि प्रथा, जमीन अतिक्रमण, अधिग्रहण और धर्मांतरण पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि पेसा कानून को लागू करने की 15 सालों की लड़ाई में छठी अनुसूची के तहत चुनाव की मांग उठी, लेकिन हाईकोर्ट ने पेसा लागू करने का आदेश दिया है। जो आदिवासी जीवनशैली छोड़ चुके हैं, वे आदिवासी नहीं माने जाएंगे, जो कोर्ट में साबित हो चुका है।

कार्यक्रम को प्रो. ज्योतिंद्र बेसरा, सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता सुभाशीष रशिक सोरेन, प्रो. बापी सोरेन, विजय कुजूर, तोरोप परगना सुशील कुमार हांसदा, गणेश पाट पिंगुवा, सिदो-कान्हू मुर्मू के वंशज मंडल मुर्मू, रत्नाकर भेंगरा, बीएचयू के प्रो. राजू माझी समेत कई बुद्धिजीवियों ने संबोधित किया।

कार्यक्रम का आयोजन और भागीदारी

आदिवासी सांवता सुशार अखाड़ा द्वारा आयोजित इस महा दरबार में झारखंड, बंगाल और ओडिशा से हजारों माझी बाबा व आदिवासी बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। समाज के बुद्धिजीवियों ने आदिवासी हितों के लिए लंबा संघर्ष छेड़ने की तैयारी जताई। यह आयोजन आदिवासी समुदाय की एकजुटता का प्रतीक बना।

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