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सिमडेगा: शांति भवन मेडिकल सेंटर में अनियमितताओं का अंबार, जांच की मांग तेज

शंभू कुमार सिंह

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सिमडेगा जिले के बीरू स्थित शांति भवन मेडिकल सेंटर पर गंभीर आरोप लगे हैं। अस्पताल नियमों को ताक पर रखकर कर्मचारियों का शोषण कर रहा है, जबकि मरीजों से इलाज के नाम पर लूट मचाई जा रही है। इंटक नेता ने बिना कागजी कार्रवाई पूरे किए अस्पताल के संचालन पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग की है। वहीं, आदिवासी प्रदेश कांग्रेस के स्टेट कोऑर्डिनेटर दिलीप तिर्की ने सिविल सर्जन को आवेदन देकर कार्रवाई की गुहार लगाई है।

IPHS मानकों का खुला उल्लंघन, अस्पताल ‘डिस्पेंसरी’ से भी बदतर

दिलीप तिर्की ने आवेदन में कहा है कि 100 बेड वाला यह मल्टी स्पेशलिस्ट अस्पताल IPHS (इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड्स) मानकों से पूरी तरह दूर है। राज्य सरकार के स्वास्थ्य नियमों, श्रम कानूनों और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों का गंभीर उल्लंघन हो रहा है। IPHS मानक किसी भी अस्पताल के लाइसेंस के लिए जरूरी हैं, लेकिन यहां की संरचना इतनी जर्जर है कि यह डिस्पेंसरी चलाने लायक भी नहीं है।

– डॉक्टरों की कमी: सभी विभागों में तीन डॉक्टर (सीनियर पीजी डॉक्टर, जूनियर डॉक्टर और असिस्टेंट डॉक्टर) होने चाहिए, लेकिन यहां एक डॉक्टर पूरे अस्पताल की देखरेख कर रहा है।
– उपकरणों की बदहाली: सीटी स्कैन पिछले छह महीनों से खराब है, पोर्टेबल एक्स-रे मशीन से काम चलाया जा रहा है। कई विभाग सिर्फ कागजों पर हैं।
– स्टाफ की कमी: नर्सिंग, पैरामेडिकल और सपोर्ट स्टाफ IPHS मानकों से बहुत कम हैं। डायग्नोस्टिक, लैब और इमरजेंसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

मिशनरी ट्रस्ट से कॉरपोरेट हाथों में, FCRA रद्द होने के बावजूद संचालन

अस्पताल एक मिशनरी ट्रस्ट के तहत पंजीकृत है, जिसका FCRA (फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) रद्द हो चुका है। दिलीप ने सवाल उठाया कि कॉरपोरेट लोगों द्वारा इसे कैसे संचालित किया जा रहा है, जबकि ट्रस्ट को कॉरपोरेट नहीं सौंपा जा सकता।

कर्मचारियों का शोषण और मरीजों की लूट

– वेतन में देरी: कर्मचारियों को कई महीनों से वेतन नहीं दिया जा रहा, जो श्रम कानूनों का उल्लंघन है।
– अवैध नियुक्तियां: बिना विज्ञापन के लाखों रुपये वाली नौकरियां दी जा रही हैं। वर्तमान में भी बिना इश्तेहार बहाली जारी है।
– मरीजों पर अत्याचार: दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों से मरीजों को फंसाकर अस्पताल लाया जाता है और इलाज के नाम पर लूटा जाता है।
– लाइसेंस की कमी: अस्पताल का पॉल्यूशन लाइसेंस फेल है, रैप (संभवतः रैंप या कोई अन्य सुविधा) नहीं है, और फायर लाइसेंस भी नहीं है। आग लगने पर जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है।
– CTO लाइसेंस का रहस्य: जिला स्वास्थ्य विभाग ने इन मानकों के बिना CTO (कंसेंट टू ऑपरेट) लाइसेंस कैसे जारी किया? इसमें पैसे के लेन-देन की आशंका है।

दिलीप तिर्की ने कहा कि मामला गंभीर है और न्यायालय का दरवाजा खटखटाना जरूरी है। उन्होंने IPHS मानकों पर RTI से जानकारी मांगी है, जो मिलते ही हाईकोर्ट में केस दायर किया जाएगा। जिले के अन्य प्राइवेट अस्पतालों की भी जांच के लिए उपायुक्त से टीम बनाने की मांग की गई है। आवेदन की कॉपी भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री, राज्य सरकार के हेल्थ सेक्रेटरी को मेल की गई है, साथ ही FCRA जांच की मांग की गई है।

सिविल सर्जन का वादा: दो दिनों में जांच

सिविल सर्जन सिमडेगा ने मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पूरे मामले की दो दिनों में जांच की जाएगी और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई होगी।

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