Debate reignites over tribal identity: ‘Vanvasi’ or ‘Vatican-vasi’?

आदिवासी पहचान पर फिर छिड़ी बहस, ‘वनवासी’ और ‘वैटिकन-वासी’ शब्दों को लेकर IRS निशा उरांव ने उठाए सवाल

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रांची। झारखंड में आदिवासी समाज की पहचान और पारंपरिक संस्कृति को लेकर चल रही बहस अब सोशल मीडिया तक पहुंच गई है। IRS अधिकारी निशा उरांव की एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद ‘आदिवासी’, ‘वनवासी’ और ‘वैटिकन-वासी’ जैसे शब्दों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

निशा उरांव ने अपनी पोस्ट में सवाल उठाया कि आदिवासी समाज को पहचानने और परिभाषित करने के लिए किन शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से ‘वनवासी’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए इसे आदिवासी पहचान को एक सीमित दायरे में देखने से जोड़ा है।

सरना आस्था को बताया मूल सांस्कृतिक पहचान

निशा उरांव की टिप्पणी का एक प्रमुख हिस्सा झारखंड के सरना स्थलों और पारंपरिक आदिवासी आस्था से जुड़ा है। उनका कहना है कि सरना स्थल आदिवासी समाज की पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

उनकी दलील है कि आदिवासी समुदाय की पहचान केवल जंगल या वन क्षेत्र में रहने तक सीमित नहीं है। उनकी अपनी धार्मिक परंपराएं, रीति-रिवाज, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत है। इसलिए पहचान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों को लेकर सावधानी जरूरी है।

आखिर ‘वनवासी’ शब्द पर विवाद क्यों?

‘वनवासी’ का सामान्य अर्थ वन में रहने वाला व्यक्ति या वन क्षेत्र से जुड़ा समुदाय होता है। हालांकि, झारखंड के आदिवासियों में इस शब्द को लेकर वैचारिक मतभेद हैं।

जानकर मानते हैं कि ‘आदिवासी’ शब्द उनकी ऐतिहासिक और मूलनिवासी पहचान को दर्शाता है, जबकि ‘वनवासी’ शब्द उनकी पहचान को केवल जंगल में रहने वाले समुदाय तक सीमित कर देता है। दूसरी ओर, कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन ‘वनवासी’ शब्द का इस्तेमाल आदिवासी समुदायों के संदर्भ में करते हैं।

इसी अंतर के कारण दोनों शब्दों को लेकर लंबे समय से वैचारिक बहस होती रही है।

‘वैटिकन-वासी’ क्या है?

यहां ‘वैटिकन-वासी’ शब्द को लेकर भी स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है। ‘वैटिकन-वासी’ आदिवासी समाज की कोई आधिकारिक या मान्य सामाजिक श्रेणी नहीं है। वैटिकन सिटी इटली में स्थित रोमन कैथोलिक चर्च का मुख्यालय है।
वैटिकन-वासी’ शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया गया है की झारखंड में आदिवासियों का एक बड़ा वर्ग क्रिश्चियन धर्म में कन्वर्ट हो गया है। जो अब आदिवासी परम्पराओं को छोड़ क्रिश्चियन धर्म अपना चुके है । हालांकि उनमें से कई लोगो का कहना हैं की वे आदिवासी परंपरा भी मानते है । लेकिन आरोप लगता है की ये चर्च से कंट्रोल होते है।

धर्म और पहचान का सवाल

दूसरी तरफ झारखंड में आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। पारंपरिक सरना आस्था को अलग धार्मिक पहचान देने की मांग भी विभिन्न आदिवासी संगठनों की ओर से उठती रही है।
ऐसे में निशा उरांव की टिप्पणी ने इसी बहस को नया संदर्भ दे दिया है। अब देखने वाली बात यह होगी कि आदिवासी संगठनों, सामाजिक समूहों और राजनीतिक दलों की ओर से इस टिप्पणी पर किस तरह की प्रतिक्रिया सामने आती है।

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