झारखंड सरकार के पहली वर्षगांठ पर आजसू ने मनाया विश्वासघात दिवस.
Team Drishti.
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!रांची : आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश कुमार महतो ने कहा है कि हेमंत सोरेन की सरकार ने पहले साल में ही जनता के विश्वास को तोड़ा है। चुनाव से पहले किए तमाम घोषणाएं और वादे के साथ विश्वासघात किया गया है। सबसे ज्यादा विश्वासघात हुआ है झारखंडी भावना और जनादेश के साथ। भावनाओं के साथ खिलवाड़ खतरनाक होता है।
रांची स्थित पार्टी कार्यालय में विश्वासघात दिवस कार्यक्रम में बोलते हुए आजसू प्रमुख ने कहा कि ‘विश्वासघात’ शब्द के मायने हैं। हमारी पार्टी बहुत सहजता और भरोसे के साथ सरकार को चुनौती देती है कि वह झारखंड में अबुआ राज स्थापित करने के स्लोगन गढ़े, पर युवा, किसान, महिला, बेरोजगार, लाचार, बुजुर्ग और प्रबुद्धजनों के विश्वास को नहीं तोड़े। कोरोनाकाल का संकट बताने भर से सरकार की नाकामियां नहीं छिप सकती।
उन्होंने कहा कि आजसू पार्टी महज विरोध की खतिर आज पूरे राज्य में ‘विश्वासघात दिवस’ नहीं मना रही है, बल्कि राज्य की साढ़े तीन करोड़ जनता को विचार मंथन और जनादेश का हिसाब लेने के लिए जगा रही है। दरअसल जनता ने जिन उम्मीदों के साथ सरकार को मजबूत जनादेश दिया है, उस कसौटी पर सरकार एक साल में कितना कारगर रही है, इसका हिसाब-किताब बेहद जरूरी है।
सुदेश महतो ने कहा, ‘सरकार चाहे कितने बड़े समारोह करे, आंकड़ों की बाजीगरी करे, झूठ का तिलिस्म सजाए, पर राज्य जिस पीड़ा और बेचौनी से गुजर रहा है, उसमें आपके वादे, इरादे, समझदारी और काम करने के तौर तरीके बेनकाब हो गए हैं। झारखंड को इस हाल में सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जनता को एकजुट करने के साथ यह पहरेदारी हम आगले चार साल तक करते रहेंगे। सरकार की नीतियां और सिस्टम पर पकड़ का जो हाल है, उसके स्पष्ट संकेत है कि अगले चार साल झारखंड के लिए भयावह दौर होगा।
विश्वासघात दिवस इसलिए जरूरी क्योंकि पूरे एक साल कोई वैकेंसी नहीं, परीक्षा नहीं, नियुक्तियां और बहाली नहीं, जबकि वादा सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन में) है कि सत्ता में आते ही पहले साल पांच लाख नौकरियां देंगे। झारखंडी जनाकांक्षा के अनुरूप स्थानीय नीति लागू करने, पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देने, 25 करोड़ के सरकारी टेंडर सिर्फ स्थानीय को देने, बेरोजगारी भत्ता और महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने के वादे पर सरकार विफल रही।
पंचायत चुनाव कराने में सरकार विफल रही। गांव की सरकार अफसरों के जिम्मे कर दी गई। पारा शिक्षकों की नियुक्ति नियमावली नहीं बनी। अनुबंध और मानदेय पर काम करने वाले लाखों झारखंडी युवा अपने हाल पर पड़े रहे। अलबत्ता आंदोलन करते युवाओं को लाठी और दमन का सामना करना पड़ा। जल, जगंल, जमीन की सुरक्षा के ध्येय और वादे के साथ सत्तारूढ़ हुए, पर पूरे राज्य में बालू, पत्थर और खनिज संपदा की लूट मची है. एनजीटी के आदेश की धज्जियां उड़ती रही। टेंडर और चालान के नाम पर लूट का खेल जारी है।
नई सरकार गठन पर पिछली सरकार के काम को आगे बढ़ाना जरूरी माना जाता है, पर कई योजनाएं बंद कर दी गई और हर बात पर और आर्थिक मोर्चे पर कमजोरियों को छिपाने के लिए केंद्र सरकार पर दोष मढ़े जाते रहे। चुनाव से पहले किसानों की कर्जमाफी का वादा। सात हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज हैं किसानों पर। इस साल दो हजार करोड़ माफ करने की तैयारी। अब तक फाइलों से पैसे नहीं निकले।
प्रवासी मजदूरों के नाम पर सबसे ज्यादा भावना से खेला गया। जबकि रोजगार प्रबंधन पर सरकार पूरी तरह नाकाम रही। सात लाख प्रवासी मजदूर लॉकडाउन में वापस लौटे और उतनी ही तेजी से बैरंग फिर दूसरे राज्यों में लौटते चले गए। स्किल्ड प्रवासियों को अपने राज्य में रोकने में सरकार नाकाम रही।
जीएसटी कंपनसेशन के नाम पर सरकार केंद्र सरकार से टकराव लेते रहे। जबकि दूसरे राज्यों ने केंद्र की सलाह पर कर्ज लेकर विकास की गति को जारी रखा। राज्य सरकार अपनी आमदनी के स्त्रोत को मजबूत करने के लिए सिस्टम डेवलप करने में नाकाम रही। राज्य सरकार ने 86 हजार 370 करोड़ का बजट पास किया, लेकिन पैसे खर्च हों, योजनाएं गति पकड़े इसके लिए जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकी।
कोरोनाकाल में मुश्किलें गिनाने में सरकार हमेशा आगे रही, पर एक ही साल में तीन हजार से ज्यादा अफसरों-इंजीनियरों के तबादले किए गए। यह काम सिर्फ नीजि हितों के लिए किए गए। पूरे राज्य में विश्वासघात दिवस आयोजित किया गया। इस मौके पर हर जिला में जनपंचायत लगाकर सरकार के विश्वासमत लेने के पूर्व किए गए वादों को बताया गया।

















