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आजसू पार्टी को लगातार झटके: केंद्रीय महासचिव विजय साहू का इस्तीफा, पवन साहू और सुरेंद्र महतो ने थामा जयराम महतो का साथ

आजसू पार्टी को लगातार झटके: केंद्रीय महासचिव विजय साहू का इस्तीफा, पवन साहू और सुरेंद्र महतो ने थामा जयराम महतो का साथ

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रांची, 20 जुलाई: झारखंड की राजनीति में ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) पार्टी के लिए चुनौतियों का दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। 2024 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी अपनी खोई ताकत को फिर से हासिल करने की जद्दोजहद में जुटी है, लेकिन इस बीच उसे एक के बाद एक बड़े झटके लग रहे हैं। ताजा घटनाक्रम में पार्टी के केंद्रीय महासचिव और तेज-तर्रार वक्ता विजय कुमार साहू ने रविवार को अपने पद और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उसी दिन मांडू विधानसभा क्षेत्र के जुझारू कार्यकर्ता पवन साहू और सुरेंद्र महतो समेत कई युवा नेताओं ने आजसू छोड़कर जयराम कुमार महतो की अगुवाई वाली झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) में शामिल होने का ऐलान किया।

विजय साहू का इस्तीफा: संगठन की दिशा पर सवाल

विजय कुमार साहू, जो पूर्व में रामगढ़ जिला अध्यक्ष रह चुके हैं, आजसू के एक प्रमुख ओबीसी चेहरे और प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने मांडू, रामगढ़, और बड़कागांव विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके अचानक इस्तीफे ने पार्टी के भीतर और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। विजय साहू ने अपने इस्तीफे में पार्टी की दिशा और नीतियों पर गहरे सवाल उठाए। उन्होंने केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश कुमार महतो को भेजे अपने इस्तीफा पत्र को फेसबुक पर साझा करते हुए लिखा:

> “24 सालों तक मैंने आजसू पार्टी के लिए जी-जान से काम किया। जिस सोच और उद्देश्य के साथ संगठन को सींचा, वह अब पूरा होता नहीं दिख रहा। जनहित के मुद्दों पर पार्टी का रुख स्पष्ट नहीं है, जिसके कारण मेरे मन में लंबे समय से दुविधा बनी हुई थी। इसलिए मैंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और केंद्रीय महासचिव के पद से इस्तीफा देने का फैसला किया।”

विजय साहू ने अपने अगले कदम के बारे में कोई खुलासा नहीं किया, जिससे यह चर्चा जोरों पर है कि वे किस दिशा में अपनी नई राजनीतिक पारी शुरू करेंगे। उनके एक हालिया फेसबुक पोस्ट और वीडियो ने पहले ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी।

उनके वीडियो में भी युवाओं के राजनीतिक उपयोग पर तीखा प्रहार देखने को मिला। उन्होंने कहा, “राजनीति में युवाओं को सिर्फ इस्तेमाल करना बंद करें।”

गौरतलब है कि 2022 में रामगढ़ जिला अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद भी विजय साहू ने पार्टी छोड़ने की घोषणा की थी, लेकिन सुदेश महतो के मान-मनौव्वल के बाद वे बने रहे और बाद में केंद्रीय महासचिव बनाए गए। इस बार, हालांकि, उनका इस्तीफा अंतिम प्रतीत होता है, क्योंकि उन्होंने पार्टी की कार्यशैली पर गहरी नाराजगी जताई है।

पवन साहू और सुरेंद्र महतो का जेएलकेएम में जाना

विजय साहू के इस्तीफे के साथ ही मांडू विधानसभा क्षेत्र के डाड़ी निवासी और आजसू के सक्रिय कार्यकर्ता पवन साहू ने भी पार्टी छोड़ने का ऐलान किया। उनके साथ सुरेंद्र महतो और कई अन्य युवा कार्यकर्ताओं ने जयराम महतो की झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) में शामिल होने का फैसला किया। रविवार को मांडू के केदला में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में जयराम कुमार महतो और पार्टी नेता बिहारी महतो ने इन कार्यकर्ताओं का स्वागत किया।

पवन साहू ने शनिवार को ही सोशल मीडिया पर संकेत दे दिया था कि वे आजसू से मोहभंग हो चुके हैं। जेएलकेएम में शामिल होने के बाद उन्होंने कहा:

> “मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह फैसला जरूरी था। जयराम महतो झारखंड के जमीनी मुद्दों—विस्थापन, स्थानीयता, और ओबीसी आरक्षण—पर जिस तेवर के साथ संघर्ष कर रहे हैं, उनके कंधे को मजबूत करना हमारा लक्ष्य है। आजसू ने जनता का विश्वास खो दिया है। युवाओं के लिए वहां कोई राजनीतिक भविष्य नहीं दिखता। “

पवन साहू ने यह भी कहा कि 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद बड़कागांव की जनता छली हुई महसूस कर रही है। उनके इस बयान को आजसू की हार और नेतृत्व की रणनीति पर सवाल के रूप में देखा जा रहा है।

जयराम महतो का बढ़ता प्रभाव

जयराम महतो की जेएलकेएम ने 2024 के विधानसभा चुनाव में भले ही केवल एक सीट (डुमरी) जीती, लेकिन इसने आजसू और भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक, खासकर कुर्मी समुदाय, को भारी नुकसान पहुंचाया। जयराम ने 33 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे और 14 सीटों पर जीत-हार के अंतर को प्रभावित किया। सिल्ली, रामगढ़, इच OH3
इचागढ़, और बेरमो जैसी सीटों पर उनकी पार्टी ने आजसू और भाजपा के वोट काटे।

जयराम महतो ने विस्थापन, स्थानीयता, और ओबीसी आरक्षण जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया है। शनिवार को बड़कागांव में विस्थापन के सवाल पर उनकी सभा में भारी भीड़ जुटी, और रविवार को केदला में आयोजित जेएलकेएम के कार्यक्रम में भी समर्थकों का बड़ा जमावड़ा देखा गया। जयराम का फोकस गोमिया, बड़कागांव, मांडू, रामगढ़, जुगसलाई, सिल्ली, इचागढ़, चंदनकियारी, टुंडी, और बेरमो जैसे क्षेत्रों पर है, जो लंबे समय तक आजसू का गढ़ रहे हैं।

25 जुलाई को बोकारो में जेएलकेएम का महाधिवेशन होने वाला है, जिसमें संगठन विस्तार और 2029 के विधानसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा होगी।

आजसू की चुनौतियां और आंतरिक असंतोष

2024 का विधानसभा चुनाव आजसू के लिए बेहद निराशाजनक रहा। एनडीए गठबंधन के तहत 10 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी केवल मांडू सीट जीत सकी, जहां निर्मल महतो ने महज 231 वोटों से जीत हासिल की। पार्टी सुप्रीमो सुदेश महतो ने हार की समीक्षा में एनडीए के भीतर समन्वय की कमी को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि नेतृत्व ने अपने राजनीतिक हितों के लिए युवाओं का इस्तेमाल किया और टिकट वितरण में कुछ खास लोगों को प्राथमिकता दी।

पार्टी छोड़ने वालों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। हाल ही में केंद्रीय संगठन सचिव एस अली और युवा आजसू के रांची जिला सह-प्रभारी अभिषेक कुमार ने भी इस्तीफा दे दिया। दूसरी ओर, आजसू नए चेहरों को शामिल करने के लिए दनादन मिलन समारोह आयोजित कर रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये प्रयास घावों पर मरहम नहीं बन सकते।

आजसू की हार का विश्लेषण

2024 के विधानसभा चुनाव में आजसू की हार ने कई सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का प्रदर्शन 2019 के मुकाबले और खराब रहा, जब उसने चार सीटें जीती थीं। इस बार सिल्ली, रामगढ़, और लोहरदगा जैसी सीटों पर पार्टी को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। जयराम महतो की जेएलकेएम ने इन सीटों पर आजसू के वोट बैंक को गहरी चोट पहुंचाई।

पार्टी के भीतर यह चर्चा जोरों पर है कि नेतृत्व ने कुर्मी समुदाय और युवाओं के हितों को नजरअंदाज किया।

आगे की राह और सियासी समीकरण

आजसू के लिए यह समय आत्ममंथन का है। जयराम महतो की जेएलकेएम ने कुर्मी समुदाय और युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाई है, जो आजसू का पारंपरिक वोट बैंक रहा है। जयराम का जोर स्थानीय मुद्दों पर और उनकी आक्रामक रणनीति ने उन्हें युवाओं और ग्रामीण मतदाताओं के बीच लोकप्रिय बनाया है। दूसरी ओर, आजसू के सामने अपनी विश्वसनीयता और संगठनात्मक ढांचे को फिर से मजबूत करने की चुनौती है।

जयराम महतो का उभार और आजसू का कमजोर प्रदर्शन यह सवाल उठाता है कि क्या झारखंड की राजनी ति में कुर्मी समुदाय का नेतृत्व अब जयराम के हाथों में चला जाएगा? 2029 का विधानसभा चुनाव इस सवाल का जवाब देगा, लेकिन फिलहाल जेएलकेएम की बढ़ती ताकत और आजसू की कमजोर स्थिति नए सियासी समीकरणों को जन्म दे रही है।

 

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