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बिहार चुनाव 2025: डिजिटल रणभूमि पर छिड़ा है नया युद्ध, सोशल मीडिया पर मौजूदगी वैकल्पिक नहीं अनिवार्य

नवीन कुमार

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की उल्टी गिनती तेजी से चल रही है। विभिन्न राजनीतिक दलों और गठबंधनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, जबकि स्टार प्रचारक दिन-रात एक कर जीत की राह तलाश रहे हैं। लेकिन इस बार का चुनाव कई मायनों में अलग है। जहां एक ओर पारंपरिक रैलियां और जनसभाएं जारी हैं, वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म ने राजनीतिक रणनीतियों को नया आयाम दे दिया है। सड़कों से लेकर स्क्रीन तक, यह चुनाव अब बहुआयामी हो चुका है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म: नया चुनावी रणक्षेत्र

पहले चुनावी शोर सड़कों, पोस्टरों और मंचों तक सीमित रहता था, लेकिन अब फेसबुक, एक्स (पूर्व ट्विटर), इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म बिहार की राजनीति का प्रमुख युद्धक्षेत्र बन चुके हैं। राजनीतिक दल अब अच्छी तरह समझ चुके हैं कि वोटर केवल सभाओं में ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन भी सक्रिय हैं।

देश में 70 प्रतिशत लोगों के पास इंटरनेट की पहुंच है, यानी हर 10 में से 7 व्यक्ति डिजिटल दुनिया का हिस्सा हैं। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, औसत व्यक्ति अपने समय का 52 प्रतिशत स्क्रीन पर बिताता है। इसी वजह से डिजिटल रणनीति अब दलों के लिए मजबूरी बन गई है। हर पार्टी ने अपनी डिजिटल कैंपेन टीम गठित की है, जो कंटेंट क्रिएशन, मीम्स, रील्स और वीडियो संदेशों के जरिए वोटरों तक पहुंच रही है।

अब नारे दीवारों पर ही नहीं लिखे जाते, बल्कि “ट्रेंडिंग हैशटैग” के रूप में वायरल हो रहे हैं। #Bihar2025, #YuvaBihar और #VikasKiBaat जैसे टैग सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं, जो पार्टियों के संदेशों को तेजी से फैला रहे हैं।

युवा मतदाताओं पर केंद्रित रणनीति

बिहार के चुनावी समीकरण में युवा वोटरों की भूमिका निर्णायक है। राज्य के लगभग 60 प्रतिशत वोटर 40 वर्ष से कम उम्र के हैं, जो सोशल मीडिया पर सबसे अधिक सक्रिय हैं। पार्टियां अपने संदेशों को डिजिटल भाषा में ढाल रही हैं।

चाहे पलायन का मुद्दा हो, रोजगार और शिक्षा की बात हो, या फिर भ्रष्टाचार, विकास, नारी सशक्तिकरण और कानून व्यवस्था जैसे विषय—सब कुछ रील्स, ट्वीट्स और शॉर्ट वीडियोज के जरिए युवा दिलों तक पहुंचाया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, विपक्षी दल रोजगार के वादों को मजेदार मीम्स के माध्यम से प्रचारित कर रहे हैं, जबकि सत्ताधारी गठबंधन विकास परियोजनाओं के ड्रोन फुटेज शेयर कर रहा है। यह रणनीति न केवल युवाओं को आकर्षित कर रही है, बल्कि उन्हें वोट डालने के लिए प्रेरित भी कर रही है।

नेताओं की अनिवार्य ऑनलाइन उपस्थिति

आज के दौर में नेताओं के लिए सोशल मीडिया पर मौजूदगी वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गई है। हर प्रमुख नेता अपने आधिकारिक अकाउंट से नियमित अपडेट, वीडियो और रील्स साझा कर रहा है। वोटरों से सीधा संवाद, लाइव सेशन, इंटरव्यू और डिजिटल टाउन हॉल जैसी पहलें अब आम हो चुकी हैं।

यह मंच न केवल राजनीतिक छवि गढ़ने में मददगार साबित हो रहा है, बल्कि विरोधियों को घेरने का भी प्रभावी हथियार बन गया है। एक ट्वीट या वीडियो से ही लाखों वोटरों तक संदेश पहुंच जाता है, जो पारंपरिक तरीकों से कहीं अधिक तेज है।

फेक न्यूज और नैरेटिव की जंग: चुनौतियां बढ़ीं

सोशल मीडिया ने संवाद को आसान तो बनाया है, लेकिन भ्रामक सूचनाओं का खतरा भी बढ़ा दिया है। फेक न्यूज, एडिटेड वीडियो और अफवाहें वायरल होकर चुनावी माहौल को प्रभावित कर रही हैं। दलों की मीडिया टीमों को अब प्रचार के साथ-साथ डैमेज कंट्रोल भी करना पड़ रहा है।

यह जंग अब केवल संदेश पहुंचाने की नहीं, बल्कि नैरेटिव सेट करने की हो गई है। पार्टियां डेटा एनालिटिक्स, माइक्रो-टार्गेटिंग और लक्षित विज्ञापनों के जरिए वोटरों के मूड को ट्रैक कर रही हैं। हर क्षेत्र, जातीय समूह और आयु वर्ग के लिए अलग-अलग संदेश तैयार किए जा रहे हैं। राजनीति अब केवल भीड़ जुटाने की कला नहीं रही, बल्कि डेटा-ड्रिवन विज्ञान बन चुकी है।

डिजिटल युग की अनिवार्यता

बिहार चुनाव 2025 ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना डिजिटल मीडिया के राजनीति अधूरी है। नेता और दल अब जनता तक पहुंचने के लिए डिजिटल रणनीतियों को अपनाने को मजबूर हैं। जहां पहले मंच से नारे गूंजते थे, अब वही प्रभाव एक ट्वीट या वीडियो से पैदा हो रहा है। यह चुनाव न केवल धरातल पर, बल्कि डिजिटल रणभूमि पर भी पूरी ताकत से लड़ा जा रहा है।

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