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सॉरी निर्भया

वरिष्ठ पत्रकार सौरव की कलम से

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ये कोई आकस्मिक घटना नहीं है सदियों की पृष्ठभूमि में एक घिनौना खेल चल रहा है ये, वैसे तो स्त्री समाज में खुद ही मजबूर, लाचार, कमजोर, अबलां और न जाने कितनी अलंकारो से सुसज्जित है। दो दिन पहले इतनी जोर शोर से बेटी दिवस मनाया जा रहा था कि लगा अब महिलाओं की स्थिति मजबूत और सुरक्षित हो गई समाज में। दो दिन पहले समाज की एक बेटी समाज और मानवता की हैवानियत को झेलते हुए आखिरी सांसें गिन रही थी।
दो दिन पहले लोग पोस्ट पर लिख रहे थे कि अधिकारी पति से पिटने वाली महिला ही दोषी है, क्योंकि उसने पिटाई के लिए उकसाया। रियली? पिटाई के लिए उकसाया, मतलब अगर वह गुस्सा होती है तो यह उसका गुस्सा नहीं, उकसाना है, जिसकी सजा में पिटना न्यायसम्मत है और पति गुस्सा हो तो गुस्सा करना, पीटना उसका अधिकार। अपनी ही फ्रेंड लिस्ट के किसी व्यक्ति की ऐसी पोस्ट देखकर क्षोभ से भर उठी थी मैं। बाद में पता चला कि उकस जाने वाले अधिकारी पति एक साथ कई महिलाओं को वस्तु समझकर उपभोग के आदी थे। फिर एक वस्तु, जिसे वह खिला पिला, उस पर खर्च कर रहे थे और अब वह पुरानी भी हो चुकी थी, वह विरोध भला कैसे कर सकती थी?

वह अधिकारी अनपढ़ या लिस्टेड अपराधी नहीं था। शायद इस लड़की के बलात्कारी भी पढ़े लिखे होंगे। फिर क्यों होता है ऐसा? इसलिए होता है कि जब फेसबुक पर एक स्वतंत्रचेता महिला की चेतना से क्षुब्ध होकर क्षुद्र पुरुष वर्ग उसका कुछ और नहीं बिगाड़ पाता तो अश्लील धमकी और गालियां देता है और इस पोस्ट को महिलाएं ये कहकर हंसते हुए समर्थन देती हैं कि वह तो है ही ऐसा सुनने लायक, और गालीबाज शरीफ है, क्योंकि उसने उन्हें तो अब तक ऐसी गाली नहीं दिया तो इस तरह वह महिलाएं सिर्फ उस स्वतंत्रचेता स्त्री को कमजोर नहीं कर रही होतीं, बल्कि पूरे स्त्री समुदाय को उपभोग की वस्तु मानने की सहमति दे रही होती हैं।
जब स्त्री की आवाज बननी चाहिए थी तब सब कहते हैं कि ये किसी एक के लिए आप पूरे समाज पर दोष नहीं मढ़ सकती हैं या बलात्कारियों के लिए आप पूरे पुरूष जाति को नहीं कोस सकती हैं। इससे ज़्यादा घृणित चेहरा यह भी है कि जब कुछ लोग आवाज़ उठाने वालों को जाति बीच में न लाने की नसीहत दे रहे हैं ठीक उसी वक़्त कुछ अपराधियों के पक्ष में उतर आया। तब मन तो यही कह रहा होता है कि जब एक समुदाय अपने समाज के बलात्कारियों के पक्ष में या बचाव में कोई भी दलील देने लग जाता है तो वह सिर्फ उस विशिष्ट अपराधी का बचाव नहीं कर रहा होता है, वह बलात्कारी मानसिकता का बचाव कर रहा होता है।

जब किसी समानता के अधिकार से आप एक स्त्री को वंचित करने के लिए तर्क ढूंढ रहे होते हैं तो आप स्त्री से सिर्फ एक अधिकार नहीं छीन रहे होते हैं, आप स्त्री के मानवीय और समानतावादी अस्तित्व के अधिकार से ही उसे वंचित कर रहे होते हैं।

फिर मनाते रहिए बेटी दिवस या पूजते रहिए कंचक, आप इन अपराधों और ऐसी आपराधिक मानसिकता को कभी भी नहीं रोक पाएंगे।

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