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असम में मुस्लिम अब सीधे तौर पर हिन्दू की जमीन नही खरीद पाएंगे । अंतर-धार्मिक जमीन हस्तांतरण पर सख्त नियम, पुलिस जांच अनिवार्य

असम में मुस्लिम अब सीधे तौर पर हिन्दू की जमीन नही खरीद पाएंगे । अंतर-धार्मिक जमीन हस्तांतरण पर सख्त नियम, पुलिस जांच अनिवार्य

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गुवाहाटी, 15 जनवरी – असम सरकार ने राज्य को “संवेदनशील” बताते हुए अंतर-धार्मिक जमीन हस्तांतरण (Inter-Religion Land Transfer) के लिए एक नई Standard Operating Procedure (SOP) लागू की है। इस फैसले के तहत अब हिंदू से मुस्लिम, मुस्लिम से हिंदू या किसी अन्य अलग धर्म के बीच जमीन की खरीद-बिक्री, दान या हस्तांतरण सीधे रजिस्ट्रेशन के जरिए नहीं हो पाएगा। हर ऐसे सौदे की गहन जांच होगी, जिसमें पुलिस की स्पेशल ब्रांच शामिल होगी।

यह SOP 27 अगस्त 2025 को असम कैबिनेट द्वारा मंजूर की गई थी और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इसे “सामाजिक संतुलन, पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा” की दृष्टि से जरूरी बताया है।

जनवरी 2026 तक यह प्रक्रिया पूरी तरह लागू है, और कई लंबित मामलों का निपटारा इसी ढांचे के तहत हो रहा है।

SOP का मुख्य उद्देश्य क्या है?

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इसे “लैंड जिहाद” और डेमोग्राफिक बदलाव (जनसांख्यिकीय परिवर्तन) को रोकने से जोड़ा है। उनका कहना है कि असम जैसे संवेदनशील राज्य में जमीन हस्तांतरण को बहुत सावधानी से संभालना जरूरी है, ताकि धोखाधड़ी, जबरन बिक्री या सामाजिक ताने-बाने पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि संवैधानिक अधिकार के तहत किसी को अपनी जमीन बेचने से पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन अब अंतर-धार्मिक सौदों में अनुमति अनिवार्य है, जिससे प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली हो गई है।अं

तर-धार्मिक सौदे की जांच प्रक्रिया (चरणबद्ध तरीके से)आवेदन – खरीदार और विक्रेता Sub-Divisional Officer (SDO) के पास आवेदन देते हैं।
प्रारंभिक जांच – SDO सामान्य दस्तावेजों की जांच करता है। अगर सौदा एक ही धर्म के लोगों के बीच है, तो कोई अतिरिक्त जांच नहीं – सामान्य रजिस्ट्रेशन हो जाता है।
अंतर-धार्मिक होने पर आगे भेजना – अगर खरीदार और विक्रेता अलग-अलग धर्मों (जैसे हिंदू-मुस्लिम) के हैं, तो मामला Deputy Commissioner (DC) के पास जाता है।
Revenue Department और Special Branch जांच – DC इसे राज्य के Revenue Department के नोडल अधिकारी के जरिए असम पुलिस की Special Branch को भेजता है।
Special Branch की जांच के मुख्य बिंदु:जमीन के दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा या अवैधता तो नहीं।
खरीदार के फंडिंग सोर्स (पैसे का स्रोत) – क्या आयकर रिटर्न में दर्ज है?
इलाके के सामाजिक ताने-बाने पर प्रभाव – क्या इससे सामुदायिक तनाव बढ़ेगा?
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कोई खतरा तो नहीं।
क्या बिक्री स्वैच्छिक है या जबरन/धोखे से?
अंतिम फैसला – Special Branch की रिपोर्ट DC को जाती है, जो मंजूरी या अस्वीकृति का फैसला लेता है। कुछ संवेदनशील मामलों में मुख्यमंत्री स्तर की मंजूरी भी जरूरी हो सकती है।

बाहरी NGOs पर भी लागू

यह SOP असम के बाहर से आने वाले NGOs पर भी लागू है, जो शैक्षिक या स्वास्थ्य संस्थान के लिए जमीन खरीदना चाहते हैं। सरमा ने केरल से कुछ NGOs का जिक्र करते हुए कहा कि वे बारपेटा, श्रीभूमि और कछार जिलों में जमीन खरीद रहे हैं, जो भविष्य में सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। असम में रजिस्टर्ड NGOs पर यह लागू नहीं होगा।

क्या पूर्ण प्रतिबंध है? क्या देशभर में लागू होगा?

पूर्ण प्रतिबंध नहीं – सरकार ने बार-बार स्पष्ट किया कि वो संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं कर सकती। लेकिन जांच प्रक्रिया इतनी सख्त है कि कई लोग इसे “प्रभावी रोक” मान रहे हैं।
देशभर में लागू नहीं – यह सिर्फ असम राज्य का फैसला है। केंद्र या अन्य राज्यों पर लागू नहीं होता। हालांकि, उत्तराखंड जैसे राज्यों में बाहरी लोगों के लिए कृषि जमीन पर प्रतिबंध हैं, लेकिन धर्म-आधारित ऐसा कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है। असम का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए उदाहरण बन सकता है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

कांग्रेस, AIUDF और CPM जैसी पार्टियों ने इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन और सांप्रदायिक विभाजन करार दिया है। उनका कहना है कि यह अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है।यह फैसला असम में असम समझौते के क्लॉज 6 और स्वदेशी लोगों की जमीन सुरक्षा से जुड़ा है।

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