दृष्टिबाधित युवाओं ने रचा इतिहास: लद्दाख की 20,000 फीट ऊंची जो-जोंगो चोटी पर फहराया तिरंगा
जमशेदपुर/पश्चिमी सिंहभूम : — दृढ़ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस और अटूट आत्मविश्वास के बल पर पश्चिमी सिंहभूम के दो दृष्टिबाधित युवाओं—शेखर और धीरोज ने वह कारनामा कर दिखाया है, जिसे सामान्य परिस्थितियों में भी बेहद कठिन माना जाता है। लद्दाख के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में आयोजित एक विशेष पर्वतारोहण अभियान में हिस्सा लेकर दोनों युवाओं ने समाज के सामने साहस, संकल्प और आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल पेश की है।
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कठिनाइयों को मात देकर तय किया हिमालय का सफर
यह साहसिक पर्वतारोहण अभियान 25 अगस्त से शुरू होकर 31 अगस्त तक चला। अभियान के दौरान दोनों पर्वतारोहियों को लद्दाख के अत्यंत कठिन मौसम, माइनस तापमान, ऊबड़-खाबड़ पत्थरों, खतरनाक ढलानों और अत्यधिक ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझना पड़ा।
चढ़ाई के दौरान धीरोज का स्वास्थ्य बिगड़ गया।
विपरीत परिस्थितियों के कारण उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर बने बेस कैंप में ही रुकना पड़ा। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी बाधाओं के बावजूद धीरोज का मनोबल कम नहीं हुआ और वे बेस कैंप से ही पूरे अभियान और अपने साथी का संबल बने रहे।
दूसरी ओर, शेखर ने अदम्य साहस और मानसिक दृढ़ता का परिचय देते हुए अपनी चढ़ाई जारी रखी। तमाम बाधाओं को पार करते हुए शेखर ने 20,000 फीट से अधिक ऊंची ‘जो-जोंगो’ (Jo-Jongo) चोटी पर कदम रखा और वहां गर्व से भारत का राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ फहराया।
संघर्ष से सफलता तक: आत्मनिर्भरता की मिसाल
शेखर और धीरोज का यह सफर सिर्फ एक पर्वत की चढ़ाई तक सीमित नहीं है। लद्दाख की ऊंचाइयों तक पहुंचने के पीछे वर्षों का कठिन संघर्ष और निरंतर अभ्यास छिपा है। दोनों युवाओं ने अपनी दृष्टिबाधिता को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
उन्होंने वर्षों की कड़ी मेहनत से:
ब्रेल लिपि: पढ़ना और लिखना सीखा।
स्वतंत्र गतिशीलता: बिना किसी की सहायता के अकेले यात्रा करने का हुनर सीखा।
तकनीक का उपयोग: डिजिटल उपकरणों और असिस्टिव तकनीक में निपुणता हासिल की।
खेल व नेतृत्व क्षमता: विभिन्न खेल गतिविधियों में भाग लेकर अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता का विकास किया।
इसी आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास ने उन्हें हिमालय की कठिनतम चोटियों को फतह करने का साहस दिया।
‘सबल’ संस्था के समावेशी प्रयासों की जीत
यह ऐतिहासिक अभियान ‘सबल’ (Sabal) संस्था के समावेशी और सशक्तिकरण प्रयासों का प्रतिफल है। यह संस्था दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 (RPwD Act 2016) के तहत दिव्यांगजनों के अधिकारों, प्रशिक्षण, क्षमता विकास और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।
सबल का उद्देश्य दिव्यांगजनों को न केवल अवसर प्रदान करना है, बल्कि उन्हें साहसिक गतिविधियों, खेल और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए जरूरी संसाधन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना है।
समाज के लिए एक सशक्त संदेश
शेखर और धीरोज की यह अभूतपूर्व उपलब्धि यह साबित करती है कि यदि सही अवसर, उचित मार्गदर्शन और दृढ़ संकल्प हो, तो शारीरिक सीमाएं किसी भी लक्ष्य के आड़े नहीं आ सकतीं। लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर रचा गया यह इतिहास देशभर के लाखों युवाओं और दिव्यांगजनों के लिए प्रेरणा का एक महान स्रोत बन गया है।

















