20 लाख टन निर्यात की मंजूरी से 10 लाख टन आयात तक: आखिर छह महीने में ऐसा क्या हुआ की चीनी को लेकर सरकार को क्यों बदलनी पड़ी रणनीति?
डेस्क : चीनी के मामले में केंद्र सरकार की नीति क्या फेल हो गयी है। क्युकी यह हम नहीं कह रहे बल्कि ये सरकार के दस्तावेज में है। दरअरसल केंद्र सरकार के चीनी निर्यात से लेकर आयत करने पर अब कई सवाल उठने लगे है ,क्युकी पिछले कुछ महीनों के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। जिस देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक होने का आकलन किया जा रहा था, उसी आधार पर सरकार ने पहले चीनी के निर्यात की अनुमति दी। सरकार के भारत सरकार के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) के दस्तावेजों के मुताबिक नवंबर 2025 में 15 लाख टन चीनी के निर्यात का कोटा तय किया गया और फरवरी 2026 में अतिरिक्त 5 लाख टन निर्यात की अनुमति देने की प्रक्रिया शुरू की गई। लेकिन आखिर छह महीने में ऐसा क्या हुआ की अब सरकार को घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए 10 लाख टन चीनी के आयात करनी पद रही है।
यही बदलाव कई सवाल खड़े करता है—जब सरकार फरवरी और जून तक चीनी के निर्यात को मंजूरी दे रही थी, तो कुछ ही समय बाद ऐसी स्थिति क्यों बनी कि विदेश से चीनी मंगाने की जरूरत पड़ गई?

पहले समझिए, सरकार ने चीनी निर्यात की अनुमति क्यों दी थी
भारत सरकार के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) रिकार्ड के मुताबिक 2025-26 चीनी सीजन की शुरुआत में सरकार के सामने देश में उपलब्ध चीनी स्टॉक, अनुमानित उत्पादन और घरेलू खपत का संतुलन था। नवंबर 2025 में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने चीनी मिलों को कुल 15 लाख मीट्रिक टन चीनी निर्यात का कोटा आवंटित किया।
इस आदेश के तहत निर्यात की समयसीमा 30 सितंबर 2026 तक रखी गई थी। यानी सरकार का उस समय आकलन था कि घरेलू खपत की जरूरत पूरी करने के बाद भी इतनी चीनी उपलब्ध रहेगी कि सीमित मात्रा में निर्यात किया जा सके।
इसके बाद फरवरी 2026 में सरकार ने अतिरिक्त 5 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति देने का फैसला किया। हालांकि 13 फरवरी का आदेश सीधे सभी मिलों को 5 लाख टन बांटने का आदेश नहीं था, बल्कि इच्छुक मिलों से अतिरिक्त निर्यात के लिए willingness मांगी गई थी।
इससे साफ है कि उस समय सरकार चीनी की उपलब्धता को लेकर बहुत अधिक चिंतित नहीं थी। सरकार का अनुमान था कि घरेलू बाजार की जरूरत और निर्यात—दोनों को संतुलित किया जा सकता है।

फिर तस्वीर कब बदलनी शुरू हुई?
हलाकि चीनी की स्थिति केवल एक महीने के उत्पादन आंकड़े से तय नहीं होती। इसमें पूरे सीजन का उत्पादन, गन्ने की उपलब्धता, चीनी मिलों की पेराई, घरेलू खपत, एथेनॉल के लिए गन्ने और चीनी का इस्तेमाल तथा मिलों के पास उपलब्ध स्टॉक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में
2025-26 सीजन के दौरान उत्पादन अनुमान और वास्तविक उत्पादन के बीच अंतर, गन्ने की उपलब्धता तथा पेराई और एथेनॉल का उत्पादन ने बाजार की गणना को प्रभावित किया। यानी जिस समय निर्यात का फैसला लिया गया था, उस समय उपलब्धता का अनुमान अलग था। बाद में उत्पादन और स्टॉक की वास्तविक स्थिति सामने आने के साथ सरकार के सामने गणित बदलता गया।
घरेलू खपत लगातार बढ़ रही है
जाहिर है की भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में चीनी की खपत केवल घरों तक सीमित नहीं है। मिठाई, बिस्कुट, पेय पदार्थ, आइसक्रीम, खाद्य प्रसंस्करण और दूसरे उद्योगों में भी बड़ी मात्रा में चीनी की जरूरत होती है। इसके अलावा त्योहारों और शादी-ब्याह के सीजन में मांग बढ़ती है। ऐसे में सरकार को चीनी के निर्यात से पहले सोचना चाहिए था की आखिर देश को चीनी की जरुरत पड़ेगी। लेकिन शुगर क्या शुगर लॉबी की वजह से मोदी सरकार के सामने आज चीनी का संकट खड़ा हो गया है यह सोचना पड़ेगा। किस अधिकारी की गलती रही।

निर्यात ने घरेलू बाजार का स्टॉक गिराया
गौरतलब है की निर्यात की अनुमति देने का सीधा मतलब यह है कि देश में उत्पादित चीनी का एक हिस्सा विदेश भेज दिया जाना।
नवंबर 2025 में में 15 LMT और फरवरी में अतिरिक्त निर्यात की अनुमति देने के पीछे सरकार का उद्देश्य चीनी मिलों और किसानों के हितों को संतुलित करना भी हो सकता है । निर्यात से मिलों को बेहतर कीमत मिल सकती है और गन्ना किसानों के भुगतान में मदद मिलती है। लेकिन यह अनुमान लगाने से कैसे चूक गयी सरकार की अब गन्ने से सिर्फ चीनी नहीं बल्कि एथेनॉल का भी उत्पादन हो रहा है ऐसे में निर्यात करने से पहले आकलन तो जरूर करना चाहिए था। क्युकी सरकार को हर समय दो चीजों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है—किसानों और चीनी मिलों के हित में निर्यात तथा घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त चीनी की उपलब्धता।
अब 10 लाख टन आयात की जरूरत क्यों पड़ रही है?
अब यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। नवम्बर 2025 और फरवरी 2026 में सरकार के पास उपलब्ध उत्पादन और स्टॉक के जो अनुमान थे, तो क्या देश में उससे आने वाले दिनों में चीनी के कमी होने का अनुमान नहीं था या फिर आने वाले महीनो में चीनी का उत्पादन ठप्प पड़ गया जिससे देश में चीनी के दाम आसमान छूने लगे है। ऐसे में एक सवाल जरूर उठता है—क्या निर्यात कुछ ज्यादा हो गया?
पूरी कहानी का सबसे अहम राजनीतिक और आर्थिक सवाल है।
सरकार ने नवंबर में 15 LMT निर्यात की अनुमति दी। इसके बाद फरवरी में अतिरिक्त 5 LMT की प्रक्रिया शुरू हुई। यानी नीति का रुख उस समय निर्यात बढ़ाने की तरफ था।अब अगर सरकार 10 LMT आयात की तरफ बढ़ रही है, तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है की निर्यात के समय घरेलू स्टॉक और उत्पादन का अनुमान कितना था और बाद में वास्तविक आंकड़ों में कितना बदलाव आया? यदि उत्पादन अनुमान से काफी कम रहा, तो आयात की जरूरत को उत्पादन में कमी से जोड़ा जा सकता है। लेकिन अगर उत्पादन में बहुत बड़ी कमी नहीं आई और फिर भी आयात की जरूरत पड़ी, तो निर्यात की मात्रा और समय को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है
अब सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि 10 लाख टन आयात की जरूरत वास्तव में कितनी कम घरेलू उपलब्धता के कारण पैदा हुई है और इसमें नवंबर-फरवरी के दौरान दी गई निर्यात अनुमति की कितनी भूमिका है।

















