Jharkhand Rajya Sabha elections: Outsiders in the race, growing discontent among local contenders

झारखंड राज्यसभा चुनाव: बाहरी चेहरों की दौड़, स्थानीय दावेदारों में बढ़ता असंतोष

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Jharkhand Rajya Sabha elections: Outsiders in the race, growing discontent among local contenders
Jharkhand Rajya Sabha elections: Outsiders in the race, growing discontent among local contenders

नवीन कुमार 

रांची: झारखंड की राजनीति में एक बार फिर “बाहरी बनाम स्थानीय” का मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों के संभावित उम्मीदवारों के नाम सामने आने के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल उठने लगा है कि आखिर झारखंड में योग्य स्थानीय चेहरों की कमी क्यों महसूस की जा रही है।

कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव के लिए प्रणव झा को उम्मीदवार बनाया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के राजनीतिक सलाहकार और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव रहे प्रणव झा को आलाकमान की पसंद माना जा रहा है। हालांकि उनका मूल निवास बिहार के भागलपुर में है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बोकारो में हुई, लेकिन लंबे समय से वे दिल्ली में पार्टी संगठन और रणनीति से जुड़े रहे हैं। ऐसे में विपक्ष और कांग्रेस के भीतर ही कुछ नेता उनके झारखंड से सीमित राजनीतिक जुड़ाव का मुद्दा उठा रहे हैं।

वहीं भाजपा की ओर से अर्थशास्त्री और पूर्व कांग्रेस नेता गौरव वल्लभ के नाम की चर्चा तेज है। राजस्थान के जोधपुर निवासी गौरव वल्लभ ने वर्ष 2019 में झारखंड की जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। वर्तमान में वे प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य हैं। यदि भाजपा उन्हें उम्मीदवार बनाती है तो “बाहरी उम्मीदवार” को लेकर बहस और तेज हो सकती है।

इस बीच उद्योगपति परिमल नथवानी का नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में बना हुआ है। रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े नथवानी इससे पहले 2008 और 2014 में झारखंड से निर्दलीय राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। राजनीतिक गलियारों में उनकी संभावित वापसी की अटकलें लगाई जा रही हैं। चर्चा यह भी है कि वे पहली प्राथमिकता के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना चाहते हैं और इसके लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) में शामिल होने तक को तैयार हैं। हालांकि झामुमो ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं और इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का राज्यसभा चुनाव केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का भी चुनाव होगा। कांग्रेस जहां झामुमो के समर्थन पर निर्भर है, वहीं भाजपा अपने विधायकों की संख्या और संभावित क्रॉस वोटिंग की संभावनाओं पर नजर बनाए हुए है।

राज्य की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय दलों की प्राथमिकता अब स्थानीय नेतृत्व की जगह अपने भरोसेमंद रणनीतिकारों और संगठन से जुड़े चेहरों को आगे बढ़ाने की हो गई है। यही वजह है कि राज्य के कई स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में उपेक्षा की भावना दिखाई दे रही है।

18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। आने वाले दिनों में तस्वीर और साफ होगी, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि “बाहरी बनाम स्थानीय” का मुद्दा चुनावी चर्चा का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दलों की यह रणनीति चुनावी गणित में कितनी सफल साबित होती है और इसका प्रभाव भविष्य की राजनीति पर कितना पड़ता है।

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Drishti Now Desk

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