सिमडेगा: विधायक भूषण बाड़ा के मांदर की थाप पर थिरकता पूरा अखरा, डीजे की जगह ले रही आदिवासी संस्कृति
शंभू कुमार सिंह
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सिमडेगा : नेता के साथ-साथ कलाकार और संस्कृति के सच्चे रखवाले भी हैं, सिमडेगा के कांग्रेस विधायक भूषण बाड़ा। आज के दौर में जहाँ हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में डीजे की धूम मची रहती है, वहीं भूषण बाड़ा मांदर की थाप से पूरी महफिल को जीवंत कर देते हैं। उनके मांदर की पहली थाप पड़ते ही बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग तक थिरकने लगते हैं और साधारण सा कार्यक्रम पलभर में उत्सव का रूप ले लेता है।
जिले के लोग अब खुलकर कहने लगे हैं कि भूषण बाड़ा सिर्फ़ नेता नहीं, एक कुशल मांदर वादक और सच्चे कलाकार हैं। कई नेता तो सिर्फ़ फोटो खिंचवाने के लिए गले में मांदर लटका लेते हैं, लेकिन भूषण बाड़ा अलग हैं। जहाँ महफिल नहीं जम रही होती, वहाँ भी वे मांदर उठाते हैं और कुछ ही पलों में पूरा माहौल बदल देते हैं। उनकी थाप और ताल पर चलते कदम किसी पेशेवर कलाकार से कम नहीं लगते। लोगों का कहना है कि उनका अंदाज़ झारखंड के प्रसिद्ध मांदर वादक हुलास महतो की याद दिलाता है।
संस्कृति को बचाने का अनूठा तरीका
विधायक भूषण बाड़ा ने कहा, “झारखंड की संस्कृति को विलुप्त होने नहीं देंगे। मांदर और अखरा हमारी पहचान हैं। इन्हें बचाना हमारी जिम्मेदारी और नैतिक कर्तव्य है।” उनके इस प्रयास को मनोरंजन के साथ-साथ आदिवासी संस्कृति को जीवंत रखने का बेजोड़ तरीका माना जा रहा है।
ग्रामीणों-युवाओं में गर्व की लहर
कार्यक्रमों में आते ही लोग अब खुद-ब-खुद डीजे बंद कर देते हैं। उसके बाद शुरू होता है भूषण बाड़ा का मांदर और महिलाओं के लोकगीत। ग्रामीणों का कहना है, “जब हमारे विधायक मांदर बजाते हैं तो गर्व होता है कि हमारा नेता हमारी संस्कृति को जीता है।” युवा कहते हैं, “यह दृश्य हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और लोकगीत-नृत्य सीखने की प्रेरणा देता है।”
पति-पत्नी का मनमोहक आदिवासी नृत्य
खास बात यह है कि कई बार विधायक अपनी धर्मपत्नी एवं जिप सदस्य जोसिमा खाखा के साथ हाथ थामकर आदिवासी नृत्य करते हैं। यह दृश्य इतना मनमोहक होता है कि पति-पत्नी के बीच का अपार प्रेम और अटूट रिश्ता साफ़ झलकता है। पूरा अखरा तालियाँ बजाकर उनका हौसला बढ़ाता है।
भूषण बाड़ा की इस पहल की जिले भर में सराहना हो रही है। सिमडेगा आज एक नया संदेश दे रहा है – राजनीति के साथ-साथ संस्कृति को भी उतनी ही गंभीरता से जिया जा सकता है। मांदर की थाप पर झूमता सिमडेगा इस बात का जीता-जागता सबूत है।

















