रामगढ़ में बिहार फाउंड्री का जहरीला प्रदूषण: मरार की जनता की सांसों पर संकट, प्रशासन मौन

रामगढ़ में बिहार फाउंड्री का जहरीला प्रदूषण: मरार की जनता की सांसों पर संकट, प्रशासन मौन

 रामगढ़ में बिहार फाउंड्री का जहरीला प्रदूषण: मरार की जनता की सांसों पर संकट, प्रशासन मौन

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रामगढ़ : आकाश शर्मा

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रामगढ़, झारखंड का मरार, जहां कभी हरे-भरे जंगल, दामोदर नदी का किनारा और बच्चों की खिलखिलाहट इस क्षेत्र की पहचान थी, आज वहां की हवा में सांस लेना दूभर हो गया है। बिहार फाउंड्री एंड कास्टिंग्स लिमिटेड (BFCL) नामक फैक्ट्री ने इस खूबसूरत इलाके को एक जहरीले कोहरे में कैद कर दिया है। ये कोई साधारण प्रदूषण की कहानी नहीं है, ये है एक ऐसी त्रासदी, जहां अगर व्यवस्था नही सुधरी तो मासूम बच्चों की सांसें दम तोड़ती नजर आ सकती हैं, गर्भवती माताओं के सपने गर्भपात की भेंट चढ़ सकते हैं, और जवानों की वीरता को भी धुंधला कर सकता है ये काला धुआं। और सबसे शर्मनाक? इस बिगड़ते हालात के खिलाफ रामगढ़ का जिला प्रशासन, वन विभाग, छावनी परिषद और तथाकथित “जनसेवक” नेता सब मौन हैं। जैसे उनकी आत्मा को भी इस धुएं ने लील लिया हो।

रामगढ़ में बिहार फाउंड्री का जहरीला प्रदूषण: मरार की जनता की सांसों पर संकट, प्रशासन मौन

प्रदूषण का कहर: एक जीता-जागता नरक
मरार की जनता हर सुबह उस धुंध में जागती है, जो बिहार फाउंड्री की चिमनियों से उगलता है। हवा में सल्फर डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर की मात्रा इतनी है कि सांस लेना किसी युद्ध से कम नहीं। डॉ. गौतम, एक चाइल्ड स्पेशलिस्ट, बताते हैं कि छोटे-छोटे बच्चे, जो अभी दुनिया को ठीक से देख भी नहीं पाए, उनके फेफड़े, कान और गले इस जहरीले धुएं की चपेट में हैं। नाक से खून बहना, सांस लेने में तकलीफ, और कान का दर्द अब आम बीमारियां हो गई हैं।
डॉ. ममता कुमारी, जो गर्भवती महिलाओं का इलाज करती हैं, का कहना है कि फैक्ट्री का ध्वनि प्रदूषण इतना खतरनाक है कि गर्भ में पल रहे शिशुओं का विकास रुक रहा है। गर्भपात, समय से पहले प्रसव, और जन्मजात बीमारियां  हो सकती है इसके काले धुएँ से । मरार की माताओं के लिए काला धुआँ एक  डरावना सच बन चुकी हैं।

रामगढ़ में बिहार फाउंड्री का जहरीला प्रदूषण: मरार की जनता की सांसों पर संकट, प्रशासन मौन

पलायन: जब घर छोड़ना ही विकल्प 
अगर हालात नही सुधरे तो आने वाले समय मे मरार के लोग, जिन्होंने अपनी जिंदगी की कमाई से आलीशान मकान बनाए, अच्छी सोसाइटी में बच्चों के लिए सपने संजोए, आज उन मकानों में ताला मारकर पलायन कर सकते है । स्कूल, जो कभी बच्चों की हंसी से गूंजते है, खाली हो सकते हैं, क्योंकि माता-पिता अपने बच्चों को इस जहरीले माहौल से बचाना चाहते हैं। क्या यही है विकास का मॉडल? जहां आने वाले समय मे लोग अपनी जमीन, अपने घर, अपने सपनों को छोड़कर भागने को मजबूर हों?

रामगढ़ में बिहार फाउंड्री का जहरीला प्रदूषण: मरार की जनता की सांसों पर संकट, प्रशासन मौन

प्रकृति का विनाश: जंगल और नदी की चीख
बिहार फाउंड्री का कहर सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। दामोदर नदी, जो कभी इस क्षेत्र की जीवनरेखा थी, अब फैक्ट्री के जहरीले कचरे से दूषित हो रही है। आसपास के हरे-भरे जंगल, जहां पक्षियों का गीत गूंजता था, अब धीरे-धीरे बंजर हो रहे हैं। वन विभाग, जिसे प्रकृति का रक्षक होना चाहिए, चुप्पी साधे बैठा है, मानो उसे जंगलों की चीख सुनाई ही न दे।

रामगढ़ में बिहार फाउंड्री का जहरीला प्रदूषण: मरार की जनता की सांसों पर संकट, प्रशासन मौन

जवानों की अनसुनी पुकार
सबसे मार्मिक बात यह है कि फैक्ट्री से महज 500 मीटर की दूरी पर PRS और SRC जैसे सैन्य शिविर हैं, जहां हमारे देश के वीर जवान तैनात हैं। ये वही जवान हैं, जो सीमा पर अपनी जान दांव पर लगाकर हमारी रक्षा करते हैं। लेकिन आज उनकी सांसें इस प्रदूषण के जहर में घुट रही हैं। छावनी परिषद, जो इन जवानों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है, अपनी आंखें मूंदे बैठा है। क्या यही सम्मान है, जो हम अपने सैनिकों को दे रहे हैं?
जनता की लड़ाई: एकजुटता का जज्बा
मरार की जनता ने हार नहीं मानी है। समाजसेवी, डॉक्टर, शिक्षक, और आम नागरिक एकजुट होकर इस प्रदूषण के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। रामगढ़ के डीसी चंदन कुमार के दरबार में उन्होंने गुहार लगाई, “हमें सुविधाओं की भीख नहीं, साफ हवा और स्वस्थ जीवन चाहिए।” यह कोई छोटी-मोटी मांग नहीं, यह उनके अस्तित्व की लड़ाई है।
स्थानीय लोग कहते हैं,जब हमारे बच्चे बीमार पड़ रहे हैं, जब हमारी माताएं अपने गर्भ में बच्चों को खो रही हैं, जब हमारे जवान खतरे में हैं, तो करोड़ों के मकान और चमचमाती सड़कों का क्या मतलब?” यह सवाल हर उस नेता, अधिकारी और फैक्ट्री प्रबंधक के लिए है, जो इस त्रासदी को अनदेखा कर रहे हैं।
नेताओं का ढोंग और प्रशासन की बेरुखी
स्थानीय लोग बताते हैं कि नेता और सांसद आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, और फिर गायब हो जाते हैं। प्रशासन की चुप्पी तो और भी रहस्यमयी है। क्या उनके कानों तक मरार की चीखें नहीं पहुंचती? या फिर फैक्ट्री के मालिकों का रसूख इतना बड़ा है कि प्रशासन की बोलती बंद हो जाती है?
बिहार फाउंड्री ने 2022 में CSR गतिविधियों के लिए पुरस्कार जीता था। वाह! भोजन बांटने और स्वच्छता अभियान चलाने का ढोंग तो बखूबी किया, लेकिन जब बात लोगों की जिंदगी और पर्यावरण की रक्षा की आती है, तो ये फैक्ट्री नियमों को ताक पर रखकर लोगों की सांसों से खिलवाड़ कर रही है।
मरार की जनता की एक अपील
मरार की जनता को प्रदूषण से बचाओ , यह पुकार सिर्फ एक इलाके की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की है, जो साफ हवा, स्वस्थ जीवन और अपने बच्चों के लिए सुरक्षित भविष्य चाहता है। यह लड़ाई सिर्फ मरार की नहीं, बल्कि हर उस जगह की है, जहां विकास के नाम पर प्रकृति और इंसानियत का गला घोंटा जा रहा है।
प्रशासन से सवाल: कब तक चुप रहोगे? कब तक मासूमों की सांसें इस धुएं में घुटती रहेंगी?
नेताओं से सवाल: क्या वोट लेने के लिए ही जनता की याद आती है?
फैक्ट्री प्रबंधन से सवाल: क्या मुनाफे की भूख इतनी बड़ी है कि आप बच्चों, माताओं और जवानों की जिंदगी से खेल रहे हो?
दृष्टि नाउ की अपील तत्काल जांच: झारखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को फैक्ट्री के उत्सर्जन, जल और ध्वनि प्रदूषण की गहन जांच करनी चाहिए।
स्थानीय लोग नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में याचिका दायर करें।
प्रशासन तुरंत मुफ्त स्वास्थ्य शिविर आयोजित करे, ताकि प्रभावित लोगों का इलाज हो सके।
जाहिर है की मरार की जनता की ये लड़ाई सिर्फ उनकी नहीं, हम सबकी है। क्योंकि प्रदूषित हवा में सांसें  दम तोड़ने लगती है । रामगढ़ प्रशासन, अब जागो! मरार को सांस लेने दो, जीने दो!

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