BJP hatched a conspiracy to defame the Hemant government: JMM General Secretary Vinod Kumar Pandey

खनिज संशोधन बिल: JMM ने केंद्र से पूछा झारखंड के अधिकारों पर दिल्ली का पहरा क्यों?

रांची: झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों और संवैधानिक अधिकारों को लेकर राज्य की सत्ताधारी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM ) और भारतीय जनता पार्टी (BJP ) के बीच राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। झामुमो के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने एक विस्तृत प्रेस बयान जारी कर कहा की जब सवाल झारखंड के संवैधानिक अधिकार, खनिज संपदा और राज्य के राजस्व का हो, तब भाजपा ठोस जवाब देने के बजाय भ्रम फैला रही है। उन्होंने इस मुद्दे पर झारखंड भाजपा के सांसदों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि “ये पब्लिक है, सब जानती है।”

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला और संवैधानिक अधिकार

झामुमो महासचिव ने कहा कि खनिज वहन भूमि उपकर (JMBL Cess) कोई मनमाना टैक्स नहीं है और न ही इसे किसी प्रशासनिक आदेश से थोपा गया है।

सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय पीठ का निर्णय: जुलाई 2024 में सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि खनिजयुक्त भूमि भी ‘भूमि’ की श्रेणी में आती है। संविधान की सातवीं अनुसूची (State List) के तहत राज्य सरकारों को ऐसी भूमि पर कर लगाने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।

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संसद के जरिए अधिकार सीमित करने की कोशिश:

विनोद कुमार पांडेय ने सवाल उठाया कि जब सर्वोच्च न्यायालय राज्यों के इस अधिकार को मान्यता दे चुका है, तो केंद्र सरकार संसद के कानून और शर्तों के जरिए इसे व्यवहार में सीमित करने की कोशिश किस संघीय भावना के तहत कर रही है?

राजस्व का गणित: हजारों करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

भाजपा के उस तर्क पर जिसमें कहा गया कि राज्यों का राजस्व कम नहीं होगा, झामुमो ने आंकड़े सामने रखते हुए सवाल दागे:

2024-25: लगभग 1,379 करोड़ रुपये

2025-26: लगभग  7,488 करोड़ रुपये

2026-27: लगभग 13,215 करोड़ रुपये

झामुमो के अनुसार, JMBL Cess से राज्य को आगामी वर्षों में यह भारी-भरकम राजस्व मिलना अनुमानित है। झामुमो ने पूछा कि यदि केंद्र के संशोधनों से यह आय स्रोत सीमित या समाप्त होता है, तो इस भारी वित्तीय घाटे की भरपाई भाजपा किस स्रोत से करेगी?

रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, DMF और GST का नाम गिनाकर भाजपा JMBL Cess के मूल सवाल से भाग नहीं सकती। अलग-अलग राजस्व स्रोतों को एक-दूसरे का विकल्प बताना वित्तीय वास्तविकता से आंखें मूंदना है।”विनोद कुमार पांडेय

खनन का सामाजिक-पर्यावरणीय बोझ और जनकल्याणकारी योजनाएं

झामुमो ने जोर देकर कहा कि झारखंड की धरती से खनिज निकलता है और इसका सीधा नुकसान यहां के निवासियों को उठाना पड़ता है:

विस्थापन और पर्यावरण: खनन से स्थानीय जंगलों, हवा और पानी पर गहरा असर पड़ता है। आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों को सामाजिक-सांस्कृतिक कीमत चुकानी पड़ती है।

पुनर्वास और बुनियादी ढांचा: JMBL Cess से मिलने वाला राजस्व प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण सड़कों के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

जनकल्याणकारी योजनाओं पर असर: राज्य की आर्थिक क्षमता मजबूत होने से महिलाओं के लिए चलाई जा रही ‘मंईयां सम्मान योजना’, किसानों, युवाओं और गरीबों की योजनाएं मजबूत होती हैं। झामुमो ने पूछा कि महिलाओं को आर्थिक संबल देने वाली योजनाओं से भाजपा को इतनी परेशानी क्यों है?

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संवैधानिक संघवाद बनाम ‘लूट’ के आरोप

भाजपा द्वारा इसे ‘लूट’ कहे जाने और आदित्य साहू द्वारा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को संविधान पढ़ने की सलाह दिए जाने पर झामुमो ने तीखा पलटवार किया:

संवैधानिक संघवाद की रक्षा: झामुमो ने साफ किया कि केंद्र से अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना टकराव नहीं, बल्कि संवैधानिक संघवाद (Constitutional Federalism) की रक्षा है।

आदित्य साहू को सलाह: झामुमो ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से आग्रह किया कि वे केवल संघीय ढांचे वाला अध्याय ही नहीं, बल्कि संविधान की सातवीं अनुसूची और राज्यों की विधायी शक्तियों का पूरा संदर्भ पढ़ें।

आरोपों पर प्रमाण की मांग: ‘खनिज लूट’ के आरोपों पर झामुमो ने कहा कि यदि भाजपा के पास कोई प्रमाण हैं, तो उन्हें प्रेस बयान जारी करने के बजाय जांच एजेंसियों और अदालत के समक्ष रखना चाहिए।

जल-जंगल-जमीन और हक के लिए संघर्ष रहेगा जारी

झामुमो महासचिव ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा केवल किसी कॉरपोरेट की बैलेंस शीट का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उन लाखों आदिवासी-मूलवासी परिवारों की जमीन से जुड़ी है जिन्होंने पीढ़ियों से इसकी कीमत चुकाई है।

उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार ऐसा कोई कानून लाती है जिससे राज्यों के संवैधानिक अधिकार सीमित होते हैं या झारखंड के राजस्व और विकास पर असर पड़ता है, तो झामुमो इसके खिलाफ पूरी मजबूती से आंदोलन करेगा। “झारखंड को उपदेश नहीं, अपने संवैधानिक अधिकारों की गारंटी चाहिए।”

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