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झारखंड में धूमधाम से मना करमा पर्व: प्रकृति और भाई-बहन के प्रेम का उत्सव

रांची : झारखंड में आज प्रकृति पर्व करमा पूजा का उल्लास चरम पर है। यह पर्व आदिवासी और मूलवासी समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जो प्रकृति के प्रति श्रद्धा और भाई-बहन के अटूट प्रेम को दर्शाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार झारखंड, बिहार, ओडिशा, और मध्य प्रदेश में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष करमा पर्व 3 सितंबर को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।

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करमा पर्व में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इस दिन करम वृक्ष की डाली की पूजा की जाती है, जिसे प्रकृति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए निर्जल उपवास रखती हैं और करम देवता की पूजा करती हैं। इस दौरान करम डाली और जावा (सात प्रकार के अनाज) की पूजा की जाती है, जो खेत-खलिहान की उन्नति और अच्छी फसल की कामना को दर्शाता है।

करमा पर्व की शुरुआत एक सप्ताह पहले से ही हो जाती है, जब बहनें नदी या तालाब के किनारे जाकर बालू में जौ के बीज बोती हैं और करमा गीतों के साथ नृत्य करती हैं। भादो एकादशी के दिन विशेष पूजा-अर्चना के साथ करम डाली को आंगन में स्थापित किया जाता है। रात भर गांवों में करमा नृत्य और पारंपरिक गीतों का आयोजन होता है, जिसमें युवक-युवतियां ढोल-मांदर की थाप पर झूमते हैं। धनबाद, रांची, कोडरमा, और दुमका जैसे जिलों में करमा महोत्सव में सैकड़ों जवैती दलों ने हिस्सा लिया, जहां पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य और गीतों ने समां बांध दिया।

करमा पर्व से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा कर्मा और धर्मा नामक दो भाइयों की है। कथा के अनुसार, कर्मा अपनी अधर्मी पत्नी के व्यवहार से तंग आकर घर छोड़कर चला गया, जिसके बाद गांव में अकाल और दुखों का दौर शुरू हुआ। छोटा भाई धर्मा उसे मनाने के लिए निकला और कठिन परिस्थितियों में उसे ढूंढ निकाला। कर्मा के वापस आने पर गांव में फिर से समृद्धि लौटी। इस कथा के माध्यम से अच्छे कर्मों और भाई-बहन के प्रेम का महत्व बताया जाता है।

करमा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का भी प्रतीक है। इस पर्व में आदिवासी और गैर-आदिवासी (सदान) समुदाय मिलकर हिस्सा लेते हैं, जो सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देता है। विशेष रूप से कुंवारी युवतियां और विवाहित महिलाएं अपने मायके में इस पर्व को मनाने के लिए उत्साहित रहती हैं। पूजा के बाद भाई बहनों को खीरे से आशीर्वाद देते हैं, जो इस पर्व की अनूठी परंपरा है।

करमा पर्व प्रकृति के संरक्षण का भी संदेश देता है। आदिवासी समुदाय प्रकृति को अपने आराध्य के रूप में देखता है, और इस पर्व के माध्यम से पेड़-पौधों और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को दोहराता है। पर्यावरणविद डॉ. कौशल किशोर जयसवाल के अनुसार, “करमा पूजा हमें यह सिखाती है कि प्रकृति के बिना हमारा अस्तित्व संभव नहीं है। यह पर्व हमें पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करता है।”

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