देशभर में गोवर्धन पूजा को लेकर उत्साह, पौराणिक कथाओं से प्रेरित भक्ति और प्रकृति का पर्व

दीपावली के ठीक एक दिन बाद, प्रथमा तिथि को आज देशभर में गोवर्धन पूजा का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। पांच दिन की दीपावली पर्व परंपरा में यह पहला ऐसा त्योहार है, जिसका वैदिक आधार स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसकी मान्यताएं पौराणिक कथाओं से गहराई से जुड़ी हैं। श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत और हरिवंश पुराण में गोवर्धन पूजा का उल्लेख मिलता है, जो इसे एक समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व प्रदान करता है।

गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण की उस लील से जुड़ी है, जिसमें उन्होंने ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। कथा के अनुसार, जब इंद्र ने भारी वर्षा कर ब्रज को जलमग्न करने की कोशिश की, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर ब्रजवासियों और उनकी गायों को सुरक्षा प्रदान की। इस घटना ने प्रकृति और मानव के बीच संतुलन के महत्व को रेखांकित किया, साथ ही इंद्र के अहंकार को तोड़कर भक्ति और समर्पण का संदेश दिया।

इस दिन लोग गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करते हैं। गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का स्वरूप बनाया जाता है और उसे फूल, माला, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री से सजाया जाता है। भक्तगण श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा के साथ गायों की सेवा करते हैं, क्योंकि गायें इस पर्व का अभिन्न अंग हैं। कई जगहों पर अन्नकूट की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसमें विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।

गोवर्धन पूजा केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी प्रतीक है। यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसकी रक्षा के महत्व को दर्शाता है। आज के समय में, जब पर्यावरण संकट एक वैश्विक मुद्दा है, गोवर्धन पूजा का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

देशभर में गोवर्धन पूजा को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है। मथुरा, वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में इस पर्व का विशेष महत्व है, जहां हजारों भक्त गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने पहुंचते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन के आयोजन हो रहे हैं। वहीं, घरों में भी लोग इस पर्व को उत्साह के साथ मना रहे हैं।


















