सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित करने वाली याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित करने वाली याचिका, याचिकाकर्ता को कहा आप अब जाइए, नहीं तो हम आप पर जुर्माना लगा देंगे…
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डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनकी आजाद हिंद फौज (INA) से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) को सुनने से साफ इनकार कर दिया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने याचिकाकर्ता के प्रति बेहद सख्त रुख अपनाया और कार्यवाही को बीच में ही रोकते हुए उन्हें कोर्ट से जाने का निर्देश दिया।
क्या थी याचिकाकर्ता की मांग?
अदालत में दायर इस याचिका में मुख्य रूप से तीन मांगें रखी गई थीं:
1. नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आधिकारिक रूप से राष्ट्र पुत्र (National Son) घोषित किया जाए।
2. यह घोषणा की जाए कि भारत की आजादी मुख्य रूप से आजाद हिंद फौज (INA) के प्रयासों से मिली है।
3. 21 अक्टूबर को विशेष दिवस के रूप में मनाया जाए।
जस्टिस सूर्यकांत की सख्त चेतावनी: “चले जाइए, वरना जुर्माना लगा देंगे
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने याचिका को ‘तुच्छ’ करार दिया। जब याचिकाकर्ता बहस जारी रखने पर अड़े रहे, तो जस्टिस सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा:
आप अब जाइए, नहीं तो हम आप पर जुर्माना (Cost) लगा देंगे। अदालत का समय ऐसे मुद्दों के लिए नहीं है जिन्हें न्यायिक आदेशों के जरिए तय नहीं किया जा सकता।”*
इतिहास पर अदालत का रुख
पीठ ने स्पष्ट किया कि इतिहास के पन्ने और महापुरुषों का कद किसी न्यायिक डिक्री (Adjudication) का मोहताज नहीं होता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि नेताजी जैसे महान व्यक्तित्वों का योगदान देश के हर नागरिक के दिल में है, और इसके लिए किसी औपचारिक घोषणा की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इतिहास की व्याख्या करना और महापुरुषों को उपाधियां देना अदालत का काम नहीं है, बल्कि यह सरकार और अकादमिक जगत का विषय है।















