झारखंड में अवैध खनन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: ट्रैक्टर पर 50 हजार और हाइवा पर 5 लाख का जुर्माना, नई नियमावली लागू
झारखंड में अवैध खनन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: ट्रैक्टर पर 50 हजार और हाइवा पर 5 लाख का जुर्माना, नई नियमावली लागू

रांची: झारखंड सरकार ने राज्य में पैर पसार चुके अवैध खनन और खनिजों के अवैध परिवहन पर लगाम लगाने के लिए अब तक का सबसे कड़ा रुख अपनाया है। कैबिनेट की हरी झंडी के बाद विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के तहत, लघु खनिजों (बालू, पत्थर, गिट्टी) की अवैध ढुलाई करते पकड़े जाने पर अब जेब ढीली नहीं, बल्कि खाली करनी पड़ सकती है।
जुर्माने में 50 गुना तक की भारी बढ़ोतरी
नए नियमों में सबसे चौंकाने वाला बदलाव ट्रैक्टरों पर होने वाले जुर्माने को लेकर है। जहाँ पहले ट्रैक्टर-ट्रॉली से अवैध खनिज ले जाने पर मात्र 1,000 का जुर्माना लगता था, वहीं अब इसे बढ़ाकर सीधे 50,000 कर दिया गया है।
वाहनों के अनुसार जुर्माने की नई दरें:
ट्रैक्टर/ट्रॉली: 50,000 (प्रति उल्लंघन)
हाइवा/डंपर: 5,00,000 तक का भारी जुर्माना
ओवरलोडिंग: तय क्षमता से 5% भी अधिक वजन मिलने पर माइनिंग विभाग सीधे कार्रवाई करेगा।
अपील करना भी हुआ महंगा
सरकार ने केवल जुर्माने ही नहीं बढ़ाए, बल्कि कानूनी प्रक्रिया को भी सख्त कर दिया है। यदि कोई वाहन मालिक दंड के खिलाफ अपील करना चाहता है, तो उसे 25,000 का नॉन-रिफंडेबल शुल्क जमा करना होगा।
जिला कलेक्टर (DC) की कार्रवाई के विरुद्ध अपील खान आयुक्त के पास होगी।
चेकपोस्ट या कांटा घर की गड़बड़ी पर अपील **जिला खनन पदाधिकारी सुनेंगे।
यह कदम अवैध निकासी रोकने और सरकारी राजस्व की चोरी को खत्म करने के लिए उठाया गया है। पर्यावरण की रक्षा हमारी प्राथमिकता है।”
चर्चा और चुनौतियां: समाधान या वसूली?
सरकार के इस फैसले ने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों और आम जनता के बीच कुछ गंभीर सवाल तैर रहे हैं:
1. आम आदमी पर बोझ: क्या ₹50,000 का जुर्माना छोटे किसानों या उन वाहन चालकों के लिए न्यायसंगत है जो अपनी आजीविका के लिए छोटे स्तर पर काम करते हैं?
2. अपील शुल्क का डर: 25,000 का भारी अपील शुल्क कहीं छोटे मालिकों के लिए कानूनी दरवाजे बंद तो नहीं कर देगा?
3. भ्रष्टाचार की आशंका: आलोचकों का मानना है कि जुर्माने की राशि जितनी बड़ी होगी, सड़कों पर ‘सेटिंग’ और भ्रष्टाचार बढ़ने का खतरा उतना ही ज्यादा होगा।
झारखंड में बालू और पत्थर का अवैध धंधा दशकों से सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है। अब जबकि JIMMS पोर्टल और नए सख्त नियम लागू हैं, यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन असली ‘खनन माफिया’ पर नकेल कस पाता है या इसकी गाज सिर्फ छोटे कामगारों पर गिरती है।

















