सिमडेगा में कमजोर पड़ रहा पशुपालन, पारंपरिक खेती और किसानों की आय पर असर

सिमडेगा: कभी पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करता था। गाय-बैल, बकरी और अन्य पालतू पशु किसानों की आजीविका से लेकर खेती की उर्वरता तक में अहम भूमिका निभाते थे। बैलों से खेत जोते जाते थे, गोबर से खाद तैयार होती थी और दूध बेचकर परिवारों को अतिरिक्त आमदनी मिलती थी। लेकिन समय के साथ खेती में मशीनों का बढ़ता इस्तेमाल, परिवारों का छोटा होना और पशुओं की देखभाल में बढ़ती मुश्किलों ने ग्रामीण पशुपालन की परंपरा को कमजोर कर दिया है। इसका असर पारंपरिक खेती और किसानों की आय पर भी दिखाई देने लगा है।

एक समय गांवों में पशुधन को किसान की संपत्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था। खेती और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक थे। खेतों से पशुओं के लिए चारा मिलता था, जबकि पशुओं के गोबर से खेतों को प्राकृतिक खाद मिलती थी। बैल खेती के काम आते थे और बकरी छोटे किसानों के लिए कम लागत में आय का साधन बनती थी। इस तरह पशुपालन ग्रामीण जीवन और कृषि व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा था।

अब ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरणों ने बैलों की उपयोगिता कम कर दी है। वहीं, रासायनिक खाद के बढ़ते इस्तेमाल के बीच गोबर खाद का उपयोग भी कई जगह पहले की तुलना में कम होता जा रहा है। पशुओं को रखने के लिए जगह, पर्याप्त चारा और उनकी नियमित देखभाल की जरूरत भी किसानों के सामने चुनौती बन रही है।

जिले के प्रमुख किसान प्रभुदान के अनुसार, पशुपालन में कमी का असर पारंपरिक खेती पर भी पड़ रहा है। गोबर खाद की उपलब्धता घटने से गोंदली-गोड़ा धान, कुथी और शकरकंद जैसी पारंपरिक फसलों की पैदावार प्रभावित हुई है। कभी स्थानीय खानपान और कृषि संस्कृति का हिस्सा रहीं ये फसलें धीरे-धीरे खेती के दायरे से बाहर होती जा रही हैं। इन फसलों में पोषक तत्वों की मौजूदगी के बावजूद इनकी खेती का रकबा और उत्पादन घटना चिंता का विषय है। हालांकि, इसके पीछे अन्य कृषि, बाजार और आर्थिक कारणों की भूमिका का आकलन भी जरूरी है।

पशुपालन में गिरावट के पीछे छोटे होते परिवार, मजदूरी का बढ़ता खर्च, चारे की उपलब्धता और पशुओं की देखभाल में लगने वाला समय जैसे कारण भी अहम हैं। ऐसे में कई किसान खेती के कामों में मशीनों पर अधिक निर्भर हो रहे हैं और पशुपालन से दूरी बना रहे हैं। विश्व पशु दिवस के अवसर पर यह मुद्दा पशुओं के संरक्षण के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के भविष्य से भी जुड़ता है। पशुपालन को फिर से खेती से जोड़ने के लिए किसानों को प्रोत्साहन, बेहतर पशु चिकित्सा सुविधाएं, चारे की उपलब्धता और गोबर खाद के उपयोग को बढ़ावा देने की जरूरत है।

पशुधन को केवल दूध या मांस उत्पादन के नजरिये से नहीं, बल्कि खेती, जैविक खाद और ग्रामीण आजीविका के व्यापक आधार के रूप में देखने की आवश्यकता है। यदि पारंपरिक खेती और पशुपालन के बीच तालमेल मजबूत किया जाए, तो इससे किसानों की आय के अवसर बढ़ाने और मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है। विकास और आधुनिक कृषि के साथ ग्रामीण खेती की उपयोगी परंपराओं को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

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