रांची: पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना, जैप-1 की 146 साल पुरानी दुर्गा पूजा की अनोखी परंपरा
मूर्ति की जगह कलश स्थापना, गोरखा जवान देते हैं बंदूकों से सलामी; अखंड दीप और चंडी पाठ भी हैं पूजा की खास पहचान
रांची। शारदीय नवरात्र के पांचवें दिन गुरुवार को मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जा रही है। राजधानी रांची के डोरंडा स्थित जैप-1 परिसर में नवरात्र के दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जा रहे हैं। यहां की दुर्गा पूजा अपनी 146 साल पुरानी परंपरा के कारण अलग पहचान रखती है। वर्ष 1880 से चली आ रही इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ गोरखा जवानों की वीरता और अनुशासन की झलक भी देखने को मिलती है।
मूर्ति की जगह कलश की पूजा
जैप-1 की दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने के बजाय कलश स्थापित कर नौ दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना के साथ अनुष्ठान शुरू होता है। इस दौरान गोरखा जवान बंदूकों से फायरिंग कर मां दुर्गा को सलामी देते हैं। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
अखंड दीप और चंडी पाठ
पूजा के दौरान जैप-1 परिसर में रहने वाले जवानों के परिवार भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यहां महिलाएं कलश स्थापना के साथ अखंड दीप प्रज्वलित करती हैं, जो महानवमी तक जलता रहता है। नौ दिनों तक चंडी पाठ और आरती का आयोजन भी पूजा का हिस्सा है। जवानों और उनके परिवारों की मान्यता है कि मां दुर्गा की आराधना से पुलिस सेवा में तैनात उनके परिजनों को शक्ति और सुरक्षा का आशीर्वाद मिलता है।
महानवमी पर शस्त्र पूजा
जैप-1 की परंपरा में महानवमी का विशेष महत्व है। इस दिन नौ कन्याओं की पूजा के बाद जवान अपने हथियारों की पूजा करते हैं। इसे शस्त्र पूजा कहा जाता है। जवान मां दुर्गा से अपने कर्तव्यों के निर्वहन, अभियानों में सफलता और सुरक्षा की कामना करते हैं।
आस्था और वीरता का संगम
जैप-1 की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत का भी प्रतीक है। कलश पूजा, अखंड दीप, चंडी पाठ और शस्त्र पूजा जैसी परंपराएं इसे राजधानी के अन्य पूजा आयोजनों से अलग बनाती हैं।

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