20250708 152535

दिल को झकझोर देने वाली कहानी: बैल नहीं खरीद सका तो बेटों से खिंचवाया हल !

दिल को झकझोर देने वाली कहानी: बैल नहीं खरीद सका तो बेटों से खिंचवाया हल !

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

लोहरदगा : आनंद कुमार सोनी 

लोहरदगा, झारखंड: चरहु गांव के एक दिव्यांग किसान की बेबसी की कहानी सुनकर हर किसी की आंखें नम हो जाएंगी। 2024 में वज्रपात ने लीला उरांव के बैलों को छीन लिया, और असमय बारिश ने उनकी फसलों को बर्बाद कर दिया। आर्थिक तंगी ने उन्हें इतना मजबूर कर दिया कि न तो वे नए बैल खरीद सके और न ही ट्रैक्टर का खर्च उठा पाए। मजबूरी में, लीला ने अपने दो बेटों को हल और पट्टा खींचने के लिए खेत में उतार दिया।

आंसुओं के साथ बताई आपबीती

सोमवार को जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो डबडबाई आंखों के साथ लीला ने बताया, “पिछले साल वज्रपात ने मेरे बैल छीन लिए। बारिश ने खेती चौपट कर दी। न बैल खरीदने के पैसे हैं, न ट्रैक्टर चलवाने की हिम्मत। मजबूरी में बेटों से यह काम करवाना पड़ रहा है।” उन्होंने कई जगह मदद की गुहार लगाई, लेकिन कहीं से कोई सहारा नहीं मिला।

IMG 20250708 WA0006

हिम्मत नहीं टूटी, बेटों ने थामा बाप का हाथ

दिव्यांगता और प्रकृति के प्रकोप ने भले ही लीला की चाल धीमी की, लेकिन उनकी हिम्मत को नहीं तोड़ पाया। बेटों के कंधों पर हल का पट्टा और खेतों में जुताई का दृश्य मानो उनकी भूख और गरीबी से लड़ने की जिद को बयां करता हो। यह तस्वीर न केवल उनकी मजबूरी को दर्शाती है, बल्कि परिवार के एकजुट होने की ताकत को भी उजागर करती है।

 प्रशासन का बयान

 

हालांकि इस मसले पर जिले के उपायुक्त ने कहा कि पूरी खेती ट्रैक्टर से हुई थी । लेकिन समतलीकरण के लिए उनके बच्चे मजाक के लहजे में बैठ गए थे ।यह मीडिया का रयूमर है इस तरह की कोई घटना नहीं हुई थी । लेकिन उन्होंने यह भी कहा की किसान झूठ नहीं बोलता है ।  क्योंकि मीडिया ने जब यह सवाल किया कि किसान पर कोई कार्यवाही होगी तो उन्होंने कहा कि किसान झूठ नहीं बोलते हैं  ।ऐसे में  सवाल यह है की अब हम यह नहीं कह सकते कि किसान झूठ बोल रहा था ।  इसलिए ऊपर हमने किसान की दी हुई बयान को पुरी अनकट लगाया है और डीसी के दिए हुए बयान को भी अनकट लगाया है अब आपको समझना है कि किसान झूठ बोल रहा है या उपयुक्त महोदय अब इस बात को दबाना चाह रहे हैं

वैसे लीला उरांव की यह कहानी सिर्फ एक किसान की नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों की है जो प्रकृति और व्यवस्था की मार के बीच हार नहीं मानते।

 

Share via
Share via