झारखंड के डीजीपी की नियुक्ति: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन? बाबूलाल मरांडी का तीखा हमला
रांची : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि झारखंड पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की हालिया नियुक्ति प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ फैसले का स्पष्ट उल्लंघन है। मरांडी ने दावा किया कि सरकार ने नियमों की अनदेखी कर वरीयता क्रम को ताक पर रख दिया और पक्षपातपूर्ण तरीके से निर्णय लिया।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!बाबूलाल मरांडी ने कहा कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला देकर डीजीपी नियुक्ति नियमावली में संशोधन किया था। सरकार का तर्क था कि राज्य में अनुभवी पुलिस प्रमुख की आवश्यकता है, क्योंकि कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। लेकिन मरांडी ने इसे भ्रामक करार दिया।
उन्होंने बताया कि झारखंड कैडर के तीन वरिष्ठ डीजी रैंक के अधिकारी।अनिल पालटा (1990 बैच), प्रशांत सिंह (1992 बैच) और एम.एस. भाटिया (1993 बैच)—में से कोई भी केंद्रीय डेपुटेशन पर नहीं था। इनकी सेवा अवधि क्रमशः एक, दो और तीन वर्ष शेष थी। इसके बावजूद, सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले इनसे कनिष्ठ अधिकारी को डीजीपी नियुक्त कर दिया गया।
उन्होंने आरोप लगाया है कि नियुक्ति यूपीएससी पैनल से नहीं की गई, जो प्रकाश सिंह फैसले (2006) का उल्लंघन है। राज्य की स्वयं बनाई गई नियमावली के वरीयता क्रम का भी पालन नहीं हुआ। उन्होंने कहा यह प्रक्रिया पक्षपात को बढ़ावा देती है, जिससे ट्रांसफर-पोस्टिंग में लेन-देन, वसूली, रंगदारी और फर्जी केस जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं।
बाबूलाल मरांडी ने पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता के मामले का जिक्र करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उनकी नियुक्ति के लिए सभी कायदे-कानूनों को दरकिनार किया। एसीबी और सीआईडी का प्रभार देकर अपने खिलाफ चल रही भ्रष्टाचार जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई, लेकिन बाद में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण रातोंरात उन्हें हटाना पड़ा।
उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की: “हेमंत सोरेन जी को संवैधानिक प्रावधानों और कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सम्मान करना सीखना चाहिए। डीजीपी नियुक्ति में हुए पक्षपात की समीक्षा कर अपनी गलती सुधारें।”

















