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मुड़मा जतरा आज रात से शुरू, 28 अक्टूबर को उमड़ेगी श्रद्धालुओं की भीड़; 40 पड़हा की परंपरा बनेगी आकर्षण

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रांची के मांडर स्थित मुड़मा गांव में आदिवासी आस्था, संस्कृति और परंपरा का ऐतिहासिक मेला; शक्ति खूंटा की पूजा, झंडा मिलन और मांदर की थाप के बीच जुटेंगे लोग
रांची: झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक विरासत का प्रतीक ऐतिहासिक मुड़मा जतरा 27 अक्टूबर की रात से शुरू होगा। रांची जिले के मांडर प्रखंड के मुड़मा गांव में आयोजित इस जतरा को लेकर लोगों में उत्साह है। 28 अक्टूबर को मेले में दिनभर लोगों की आवाजाही रहने की उम्मीद है। शक्ति खूंटा की पूजा, 40 पड़हा की भागीदारी, पारंपरिक झंडा मिलन और मांदर की थाप इस आयोजन के प्रमुख आकर्षण होंगे। मुड़मा जतरा सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों, सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा आयोजन है। यहां परंपरागत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और ग्रामीण बाजार की रौनक भी देखने को मिलती है।

1400 साल पुरानी परंपरा से जुड़ा है जतरा

मुड़मा जतरा को लेकर लगभग 1400 वर्ष पुरानी परंपरा की मान्यता प्रचलित है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, रोहतासगढ़ से उरांव समुदाय के लोगों के छोटानागपुर क्षेत्र में आने के बाद उनका मुंडा समुदाय से संपर्क हुआ था। दोनों समुदायों के बीच जमीन और क्षेत्र में बसने को लेकर सहमति बनने की परंपरागत कथा इस जतरा के इतिहास से जोड़ी जाती है। हालांकि, इस इतिहास और इसकी समयावधि से जुड़े विवरण मुख्य रूप से स्थानीय मान्यताओं और मौखिक परंपराओं पर आधारित हैं। आज यह जतरा आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

40 पड़हा की भागीदारी है खास पहचान

मुड़मा जतरा की प्रमुख विशेषताओं में 40 पड़हा की पारंपरिक व्यवस्था शामिल है। पड़हा आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है, जो विभिन्न गांवों को सामुदायिक स्तर पर जोड़ती है। जतरा में अलग-अलग पड़हा के प्रतिनिधियों और पारंपरिक धार्मिक अगुवाओं की भागीदारी आयोजन को विशिष्ट पहचान देती है। पारंपरिक झंडों और सामूहिक उपस्थिति के जरिए सामाजिक एकता, सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता का संदेश दिया जाता है।

शक्ति खूंटा की पूजा से होगी शुरुआत

मुड़मा जतरा में विभिन्न गांवों से आने वाले पारंपरिक सांस्कृतिक समूहों की भागीदारी रहती है। पारंपरिक झंडों के साथ होने वाला झंडा मिलन इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण माना जाता है। मांदर, ढोल और नगाड़े की आवाज के बीच पारंपरिक नृत्य और वेशभूषा मेले को उत्सवी रंग देते हैं। लकड़ी से बने हाथी-घोड़े और अन्य पारंपरिक प्रतीक भी जतरा की खास पहचान हैं। इन परंपराओं के जरिए आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने और नई पीढ़ी को उससे परिचित कराने का प्रयास किया जाता है। सभी समाजों की भागीदारी से बढ़ती है मेले की रौनक मुड़मा जतरा आदिवासी परंपरा के साथ सामाजिक मेल-मिलाप का भी महत्वपूर्ण अवसर है। विभिन्न समुदायों के लोग मेले में शामिल होते हैं और आयोजन की रौनक बढ़ाते हैं। ग्रामीण परिवारों, युवाओं और बच्चों के लिए यह अपनी परंपराओं से जुड़ने, परिचितों से मिलने और उत्सव में भाग लेने का अवसर होता है।

स्थानीय दुकानदारों को मिलेगा कारोबार का अवसर

जतरा के दौरान विभिन्न प्रकार की दुकानें और स्टॉल लगाए जाते हैं। इनमें घरेलू सामान, बर्तन, कपड़े, शृंगार सामग्री, खिलौने और खाने-पीने की वस्तुओं की दुकानें शामिल होती हैं। मेले में लोगों की आवाजाही से स्थानीय दुकानदारों और छोटे कारोबारियों को व्यापार का अवसर मिलता है। इस तरह मुड़मा जतरा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा स्थानीय बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण है। 27 और 28 अक्टूबर को राष्ट्रीय राजमार्ग-75 पर यातायात में बदलाव की जानकारी भी दी गई है।

आदिवासी विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक है मुड़मा जतरा

मुड़मा जतरा झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 40 पड़हा की परंपरा, शक्ति खूंटा की पूजा, झंडा मिलन और पारंपरिक नृत्य इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के बीच यह जतरा समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने और सामुदायिक एकता को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। 27 अक्टूबर की रात से शुरू होकर 28 अक्टूबर को दिनभर चलने वाला यह आयोजन मांडर में आस्था, संस्कृति और ग्रामीण जीवन का संगम प्रस्तुत करेगा।

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रिक्की राज

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रिपोर्टर

रिक्की राज को पिछले दस वर्षों का मीडिया के क्षेत्र का अनुभव है । इस दौरान पांच वर्षो से इन्होंने डिजिटल मीडिया के लिए इन्होंने कई बड़ी खबरों का कवरेज किया है ।