झारखंड में पेसा नियमावली 2025: आदिवासी स्वशासन की उम्मीद या सियासी विवाद का नया अध्याय?
झारखंड में पेसा नियमावली 2025: आदिवासी स्वशासन की उम्मीद या सियासी विवाद का नया अध्याय?
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रांची, 06 जनवरी : झारखंड में पंचायती राज विस्तार (अनुसूचित क्षेत्रों) अधिनियम, 1996 (पेसा एक्ट) की नियमावली लागू होने के साथ ही आदिवासी समाज में स्वशासन की नई उम्मीद जगी है, लेकिन यह सियासी तूफान का केंद्र भी बन गया है। 23 दिसंबर 2025 को हेमंत सोरेन कैबिनेट ने नियमावली को मंजूरी दी थी और 2 जनवरी 2026 को पंचायती राज विभाग ने अधिसूचना जारी कर दी। सरकार इसे जल-जंगल-जमीन की रक्षा का मजबूत कवच बता रही है, जबकि बीजेपी और पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन इसे पेसा की मूल भावना का उल्लंघन करार दे रहे हैं।
विपक्ष का आरोप: ‘पेसा की आत्मा पर कुठाराघात’
बीजेपी और चंपाई सोरेन ने नियमावली को आदिवासी विरोधी बताया है। मुख्य आरोप:ग्राम सभा की परिभाषा बदलकर राज्य नियंत्रण बढ़ाया गया।
रूढ़िगत परंपराओं, धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अनदेखी।
माइनिंग माफिया और भूमि सिंडिकेट को फायदा पहुंचाने की साजिश।
वैसे पूर्व बीजेपी सीएम (अर्जुन मुंडा, रघुवर दास) ने इसे पेसा का “कोल्ड ब्लडेड मर्डर” कहा।
पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने रांची में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि नियमावली ने आदिवासियों के साथ सबसे बड़ा धोखा किया है। उन्होंने विरोध में रांची में बड़ा प्रदर्शन और नियमावली की प्रतियां फाड़ने का ऐलान किया। टाटा लीज विस्तार और चांडिल डैम से उजड़े गांवों का भी जिक्र किया।
महागठबंधन का पलटवार: बीजेपी की ‘काली कमाई’ पर रोक
झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने बीजेपी पर पलटवार किया:विरोध इसलिए क्योंकि पेसा से अवैध माइनिंग और कमाई रुकेगी।
बीजेपी शासित पूर्व सरकारों (अर्जुन मुंडा, बाबूलाल मरांडी, रघुवर दास) ने सत्ता में रहते पेसा पर कुछ नहीं किया।
छत्तीसगढ़-ओडिशा जैसे बीजेपी शासित राज्यों में भी इसी तरह के प्रावधान।
यह नियमावली ग्राम सभा को मजबूत बनाती है, आदिवासी जनता बीजेपी की हकीकत जान चुकी है।
कांग्रेस ने भी बीजेपी को भ्रम फैलाने का आरोप लगाया।
पेसा एक्ट 1996 में पारित हुआ, लेकिन झारखंड में नियमावली बनाने में 25 साल लगे। हाईकोर्ट के दबाव और आदिवासी संगठनों की मांग के बाद यह कदम उठा। कुछ आदिवासी संगठन भी राज्य नियंत्रण बढ़ने से असंतुष्ट हैं।यह विवाद 2026 में आदिवासी राजनीति को नई दिशा दे सकता है। सरकार जागरूकता कार्यक्रम चला रही है, जबकि विरोधी आंदोलन की तैयारी में हैं। देखना यह है कि नियमावली जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है और आदिवासी समाज इसे कैसे अपनाता है।

















