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ग्रामीण अब भी नाले का पानी पीने को मजबूर: 35 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित विस्थापित परिवार

शंभू कुमार सिंह

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सिमडेगा : विकसित भारत के दावों और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं के बावजूद सिमडेगा जिले के पाकरटांड प्रखंड अंतर्गत कैरबेड़ा के राईबेड़ा डैम कॉलोनी (भागलपुर) के ग्रामीण आज भी नाले, चुआ और गड्ढों के पानी पर निर्भर हैं। दोभाया डैम निर्माण के कारण विस्थापित हुए इन परिवारों को झारखंड सरकार की पुनर्वास नीति के तहत बिजली, पेयजल, सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का वादा किया गया था, लेकिन तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ये सुविधाएं सपना ही बनी हुई हैं।

राईबेड़ा ग्राम के लगभग 30 परिवारों के करीब 115 से अधिक लोग अपनी जमीन-जायदाद खोकर भी आज पीने के साफ पानी, बिजली और गांव तक पहुंचने वाली पक्की सड़क की आस में तड़प रहे हैं। ग्रामीणों ने समय-समय पर जनप्रतिनिधियों और उपायुक्त को मांग पत्र सौंपे, प्रदर्शन किए, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए ये परिवार बड़ा वोट बैंक न होने के कारण उनकी आवाज अनसुनी रह जाती है। केवल आश्वासन मिलते हैं, अमल नहीं होता।

सरकार की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में चापाकल, वॉटर टावर और आरओ पानी जैसी सुविधाओं के बड़े-बड़े प्रचार के बीच यह तस्वीर विकास के दोहरे चेहरे को उजागर करती है। जहां एक तरफ शहरी और कुछ ग्रामीण इलाकों में पाइपलाइन से शुद्ध पानी पहुंच रहा है, वहीं इन विस्थापित परिवारों को बरसाती नाले का गंदा पानी पीकर गुजारा करना पड़ रहा है।

यह स्थिति न केवल सिमडेगा जिले के पिछड़ेपन को दर्शाती है, बल्कि पूरे राज्य और देश के सामने सवाल खड़े करती है कि आखिर कब तक विस्थापितों की अनदेखी जारी रहेगी? प्रशासनिक और राजनीतिक उपेक्षा के कारण इन ग्रामीणों का जीवन दूभर हो चुका है, और वे ‘विकसित भारत’ के नारे को मुंह चिढ़ाती हुई महसूस कर रहे हैं।

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