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अयोध्या के श्रीराम मंदिर की तर्ज पर बनेगा श्री राम जानकी तपोवन मंदिर, जानिए मंदिर का पूरा इतिहास

रांची के निवारणपुर में श्री राम जानकी तपोवन मंदिर को अयोध्या के श्रीराम मंदिर की तर्ज पर भव्य रूप में विकसित करने की योजना है। आज मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस मंदिर के पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी। भूमि पूजन के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री सह कांग्रेसी नेता सुबोधकांत सहाय समेत कई गणमान्य लोग मौजूद थे। इस मौके पर तपोवन मंदिर परिसर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी।

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यह मंदिर नागर शैली में बनाया जाएगा, जिसमें राजस्थान के मकराना से लाए गए मार्बल और धौलपुर के पत्थरों का उपयोग होगा। मंदिर का निर्माण अयोध्या के राम मंदिर के आर्किटेक्ट आशीष सोनपुरा और उनके परिवार की देखरेख में होगा।

मंदिर में 13 गर्भगृह, 117 शिलाएं और 13 शिखर होंगे, जिसमें श्रीराम, सीता, हनुमान सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित होंगी। लगभग 14,000 वर्ग फीट में बनने वाले इस मंदिर की लागत करीब 100-500 करोड़ रुपये अनुमानित है, और इसे 2028-29 तक पूरा करने का लक्ष्य है। यह पूरी तरह से दान और सहयोग से बनाया जाएगा, जिसमें भक्तों से समर्थन की अपील की गई है।

श्री राम जानकी तपोवन मंदिर, निवारणपुर झारखंड का एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। इस मंदिर का इतिहास लगभग 286 वर्ष पुराना माना जाता है, जिसकी स्थापना अंग्रेजी शासनकाल में हुई थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर के निर्माण में एक अंग्रेज अधिकारी की महत्वपूर्ण भूमिका थी, हालांकि इसके पीछे का कारण स्पष्ट नहीं है। यह मंदिर तप और आस्था का प्रतीक है, और ऐसा माना जाता है कि इसके गर्भ से सैकड़ों वर्ष पहले भगवान राम और माता सीता की मूर्तियाँ प्राप्त हुई थीं, जो आज भी यहाँ स्थापित हैं।

मंदिर का नाम “तपोवन” इसलिए पड़ा क्योंकि यह क्षेत्र कभी तपस्वियों की तपोभूमि थी। यह हरमू नदी के किनारे स्थित है, जो इसे और भी पवित्र बनाता है। मंदिर में भगवान राम, माता जानकी, और हनुमान जी की पूजा होती है, और यहाँ अयोध्या शैली में भगवान का श्रृंगार किया जाता है। रामनवमी के अवसर पर यहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, और शहर के विभिन्न अखाड़ों द्वारा निकाली जाने वाली शोभा यात्रा इस मंदिर के बिना अधूरी मानी जाती है।

1929 में पहली बार महावीरी पताका की पूजा यहाँ हुई थी, जिसे महावीर चौक के हनुमान मंदिर से लाया गया था। तब से यह परंपरा हर साल रामनवमी पर दोहराई जाती है। मंदिर के महंतों की परंपरा भी उल्लेखनीय है, जिनमें कई 100 वर्ष से अधिक आयु तक सेवा दे चुके हैं। वर्तमान में महंत ओमप्रकाश शरण मंदिर की देखरेख करते हैं।

यह मंदिर न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, जो रांची और झारखंड की आध्यात्मिक विरासत को दर्शाता है। श्री राम जानकी तपोवन मंदिर, निवारणपुर, रांची की वास्तुकला के बारे में वर्तमान में उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से इसके नवनिर्माण से संबंधित है, क्योंकि मूल मंदिर का ढांचा पुराना होने के कारण अब नया स्वरूप ले रहा है।

मंदिर की वास्तुकला के बारे में जानकारी :

मूल मंदिर की वास्तुकला: 

पुराने मंदिर का ढांचा पारंपरिक झारखंडी शैली में था, जो सादगी और स्थानीय निर्माण सामग्री पर आधारित था। मंदिर हरमू नदी के तट पर स्थित है, जिसके कारण इसका प्राकृतिक परिवेश इसे और आकर्षक बनाता था। गर्भगृह में भगवान राम, माता जानकी और हनुमान जी की प्राचीन मूर्तियाँ स्थापित हैं, जो मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती हैं। पुराने ढांचे में छोटे-छोटे गुम्बद और साधारण नक्काशी देखी जा सकती थी, जो स्थानीय कारीगरी को प्रतिबिंबित करती थी।

नवनिर्माण की वास्तुकला:

नया मंदिर नागर शैली में बनाया जा रहा है, जो उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला की एक प्रमुख शैली है और अयोध्या के श्री राम मंदिर से प्रेरित है। यह पूरी तरह से पत्थरों से निर्मित होगा, जिसमें किसी भी धातु का उपयोग नहीं होगा, जो पारंपरिक मंदिर निर्माण की विशेषता है। मंदिर का डिज़ाइन भव्य और आधुनिक होगा, जिसमें ऊँचा शिखर (गोपुरम), नक्काशीदार स्तंभ और विशाल प्रांगण शामिल होंगे। अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के मार्गदर्शन में इसका निर्माण हो रहा है, जिससे वास्तुकला में अयोध्या की भव्यता और पवित्रता का समावेश होगा। मंदिर परिसर में भक्तों के लिए सभागार, ध्यान केंद्र और अन्य सुविधाएँ भी शामिल की जाएँगी, जो इसे एक आधुनिक तीर्थ स्थल बनाएगा।

निर्माण की प्रगति और समयसीमा:

नवनिर्माण का भूमि पूजन 9 अगस्त 2024 को हुआ था, और इसका निर्माण कार्य 2028-29 तक पूर्ण होने की उम्मीद है। मंदिर का नया स्वरूप न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण होगा। यह नया मंदिर अपनी भव्य वास्तुकला के साथ झारखंड में एक प्रमुख धार्मिक स्थल के रूप में उभरेगा, जो पारंपरिक भारतीय मंदिर कला और आधुनिक निर्माण तकनीकों का संगम होगा।

 

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