Teachers are shaping the future of children from Ranchi slums.

रांची में शिक्षा का अनूठा क्लासरूम: पूर्व SDO से लेकर नारियल बेचने वाला युवा, स्लम के बच्चों का भविष्य संवार रहे शिक्षक

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रांची: देशभर में शिक्षक दिवस पर जहां स्कूल-कॉलेजों में गुरु-शिष्य के रिश्ते का जश्न मनाया जा रहा है, वहीं राजधानी रांची में एक ऐसा क्लासरूम भी है, जहां शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है। जगन्नाथपुर की स्लम बस्ती में 1982 से बिरसा निकेतन बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगा रहा है। यहां पढ़ाने वालों की अपनी जिंदगी की कहानी भी संघर्ष, मेहनत और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल है।

पूर्व SDO बच्चों को पढ़ाकर लौटा रहे समाज का प्यार

बिरसा निकेतन में बच्चों को पढ़ाने वालों में रिटायर्ड SDO धर्मनाथ राम भी शामिल हैं। बेहद कठिन परिस्थितियों में अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले धर्मनाथ राम ने पेयजल विभाग में अधिकारी के रूप में सेवा दी। नौकरी से रिटायर होने के बाद उन्होंने अपना समय बस्ती के बच्चों की शिक्षा के लिए देना शुरू किया।

उनका मानना है कि समाज ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया, इसलिए अब उनकी जिम्मेदारी है कि वे जरूरतमंद बच्चों को आगे बढ़ने में मदद करें।

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HEC के पूर्व महाप्रबंधक भी बने बच्चों के शिक्षक

इस क्लासरूम की दूसरी खासियत यह है कि यहां HEC के हेवी मशीन बिल्डिंग प्लांट के पूर्व जनरल मैनेजर जयप्रकाश प्रसाद भी बच्चों को पढ़ाते हैं। वर्ष 2022 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपनी दिनचर्या का एक हिस्सा इन बच्चों के लिए समर्पित कर दिया।

जयप्रकाश प्रसाद के लिए यह महज पढ़ाने का काम नहीं, बल्कि उन बच्चों को बेहतर भविष्य देने की कोशिश है, जिन्हें आर्थिक परिस्थितियों के कारण अच्छी शिक्षा आसानी से नहीं मिल पाती।

नारियल पानी बेचकर पढ़ाई कर रहे नितेश, फिर भी बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते हैं

बिरसा निकेतन की कहानी नितेश लोहार के बिना अधूरी है। नितेश ने अपनी पढ़ाई के लिए काफी संघर्ष किया। स्कॉलरशिप और शिक्षकों की मदद से वे आगे बढ़े और फिलहाल केमिस्ट्री से ग्रेजुएशन कर रहे हैं।

अपनी पढ़ाई और रोजमर्रा का खर्च निकालने के लिए नितेश सड़क किनारे नारियल पानी बेचते हैं। दिनभर मेहनत करने के बावजूद वे इन बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालते हैं। खास बात यह है कि इसके बदले वे बच्चों से कोई फीस नहीं लेते।

नितेश की कहानी बताती है कि आर्थिक संघर्ष किसी इंसान की मदद करने की इच्छा को रोक नहीं सकता।

किसी के पिता फुटपाथ पर दुकानदार, किसी की मां सफाईकर्मी

बिरसा निकेतन में पढ़ने वाले बच्चों के परिवारों की आर्थिक स्थिति आसान नहीं है। किसी बच्चे के पिता फुटपाथ पर छोटी-सी दुकान चलाते हैं तो किसी की मां सफाईकर्मी हैं। कई परिवार रोज की कमाई से घर चलाते हैं।

इसके बावजूद बच्चों की आंखों में बड़े सपने हैं। वे पढ़-लिखकर अपने परिवार की स्थिति बदलना चाहते हैं। बिरसा निकेतन इन्हीं सपनों को पंख देने की कोशिश कर रहा है।

एक मुलाकात ने बदल दी जिंदगी, बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया पूरा जीवन

बिरसा निकेतन की शुरुआत के पीछे केपी देव की कहानी भी बेहद खास है। बताया जाता है कि एक संपन्न परिवार से आने वाले केपी देव जब रांची आए और इन बच्चों की जरूरत तथा पढ़ने की ललक को देखा, तो वे प्रभावित हुए।

इसके बाद उन्होंने अपना जीवन इन बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया। वर्ष 1982 से शुरू हुआ यह प्रयास आज भी जारी है और कई पीढ़ियों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम कर रहा है।

महंगे स्कूलों के दौर में मुफ्त शिक्षा की मिसाल

आज के दौर में जब अच्छी शिक्षा के लिए परिवारों को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है और स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और आधुनिक सुविधाओं की चर्चा होती है, ऐसे समय में बिरसा निकेतन का यह छोटा-सा क्लासरूम एक बड़ा संदेश देता है।

यहां संसाधन भले सीमित हों, लेकिन बच्चों को पढ़ाने वाले लोगों का उत्साह और उनकी सोच बड़ी है। पूर्व अधिकारी, रिटायर्ड प्रबंधक और अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए नारियल पानी बेचने वाला युवा—सभी एक ही उद्देश्य से यहां जुटते हैं।

उद्देश्य सिर्फ बच्चों को किताबें पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनाना है।

शिक्षक दिवस के मौके पर बिरसा निकेतन की कहानी यही याद दिलाती है कि शिक्षा किसी वर्ग विशेष की संपत्ति नहीं, बल्कि हर बच्चे का बुनियादी अधिकार है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि समाज के कुछ लोग आगे बढ़कर उन बच्चों का हाथ थाम लें, जिनके सपने आर्थिक मजबूरियों के कारण अक्सर अधूरे रह जाते हैं।

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Drishti Now Desk

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