Tribal community raises a strong voice against delimitation; announces a battle stretching from Ranchi to Delhi.

परिसीमन पर आदिवासी समाज का बड़ा हुंकार, रांची से दिल्ली तक लड़ाई का ऐलान

मोरहाबादी में बारिश के बीच जुटा महाजुटान, नेताओं ने चेताया- सीटें घटीं तो सदन में कमजोर होगी आदिवासियों की आवाज; बिरसा मुंडा के उलगुलान से जोड़ी गई आज की लड़ाई

Tribal community raises a strong voice against delimitation; announces a battle stretching from Ranchi to Delhi.

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

रांची। बारिश की बूंदों के बीच रविवार को रांची का मोरहाबादी मैदान आदिवासी अधिकारों की आवाज से गूंजता रहा। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे लोगों ने परिसीमन के सवाल पर एकजुटता दिखाई। मंच से कांग्रेस के नेताओं और आदिवासी जनप्रतिनिधियों ने साफ कहा कि आने वाले परिसीमन में आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी किसी भी कीमत पर कम नहीं होने दी जाएगी। नेताओं ने इसे महज चुनावी गणित का विषय मानने के बजाय आदिवासी समाज के भविष्य और उसकी राजनीतिक ताकत से जुड़ा सवाल बताया।

आदिवासी एकता महाजुटान में बार-बार यह मुद्दा उठा कि विधानसभा और लोकसभा में आरक्षित सीटों की संख्या यदि जनसंख्या के बदलते अनुपात के साथ घटती गई तो इसका सीधा असर आदिवासी समाज की राजनीतिक आवाज पर पड़ेगा। सभा में मौजूद नेताओं ने इसके खिलाफ आंदोलन को आगे बढ़ाने की बात कही।

RKDF
advertisement

विकास मुंडा ने 2007 के परिसीमन की याद दिलाई

माड़ विधायक विकास मुंडा ने अपने संबोधन में 2007 के परिसीमन का संदर्भ देते हुए कहा कि उस समय भी आदिवासी सीटों को लेकर चिंता पैदा हुई थी और विरोध के बीच सीटों को बचाया जा सका था।

उन्होंने कहा कि परिस्थितियां अब बदल चुकी हैं। उनके मुताबिक आज केंद्र में ऐसी राजनीतिक ताकत सत्ता में है, जिसके फैसलों का असर आदिवासी क्षेत्रों पर पड़ सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि नीतियों और कानूनों के जरिए भविष्य में आदिवासी बहुल इलाकों और आरक्षित सीटों की स्थिति प्रभावित हो सकती है।

विकास मुंडा ने हसदेव जंगल का उदाहरण देते हुए वन अधिकारों और जंगलों के संरक्षण को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने असम के परिसीमन का जिक्र करते हुए दावा किया कि वहां परिसीमन के बाद आदिवासी समाज को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा।

उनका कहना था कि परिसीमन को सिर्फ नक्शे पर सीमाएं बदलने की प्रक्रिया समझना भूल होगी। इसके पीछे आने वाले वर्षों में किस समाज की कितनी राजनीतिक ताकत रहेगी, यह भी तय होगा।

Kashmir
advertisement

विक्रांत भूरिया बोले- आरक्षण ने बदली आदिवासी समाज की तस्वीर

मध्य प्रदेश से पहुंचे आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने महाजुटान को आदिवासी एकता का बड़ा प्रदर्शन बताया। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में लोगों का एक जगह जुटना ताकत दिखाता है, लेकिन असली सवाल उस ताकत को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए इस्तेमाल करने का है।

उन्होंने भाजपा पर आदिवासी पहचान को लेकर हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा के नेता आदिवासियों के लिए ‘वनवासी’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। भूरिया ने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी अलग पहचान और अस्मिता है।

अपने भाषण में उन्होंने आरक्षण को आदिवासी समाज की तरक्की का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उनका कहना था कि आरक्षण के जरिए ही समाज के लोगों को डॉक्टर, अधिकारी, सर्जन और राजनीतिक प्रतिनिधि बनने के अवसर मिले।

भूरिया ने चेताया कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर हुआ तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।

विधायक कम होंगे तो आवाज भी कमजोर होगी’

भूरिया ने परिसीमन को लेकर कहा कि विधानसभा में आदिवासी विधायकों की संख्या सिर्फ आंकड़ा नहीं है। सदन में संख्या अधिक होने पर समाज की समस्याओं को मजबूती से उठाने की क्षमता बढ़ती है।

उन्होंने कहा कि अगर आरक्षित सीटें कम होती हैं तो इसका मतलब सिर्फ एक-दो सीटों का कम होना नहीं होगा, बल्कि आदिवासी समाज की राजनीतिक ताकत में कमी आएगी।

उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के परिसीमन को आगे बढ़ाने के रुख का भी उल्लेख किया और कहा कि भविष्य में जनसंख्या और आरक्षण के अनुरूप राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

विक्रांत भूरिया ने झारखंड आंदोलन और भगवान बिरसा मुंडा के उलगुलान का जिक्र करते हुए मौजूदा संघर्ष को उसी संघर्ष की अगली कड़ी बताया। उन्होंने आदिवासी समाज को संथाल, मुंडा समेत अलग-अलग पहचान के नाम पर बांटने की कोशिशों से सावधान रहने की अपील की।

राजेश कच्छप का आरोप- खनिज क्षेत्रों में आदिवासियों को विस्थापन का खतरा

खिजरी विधायक राजेश कच्छप ने कहा कि आदिवासी समाज उसी राजनीतिक ताकत के साथ खड़ा होगा जो उसके अधिकारों की बात करेगी।

उन्होंने परिसीमन के जरिए आदिवासी आरक्षित सीटों पर असर पड़ने की आशंका जताई। कच्छप ने कहा कि जिन इलाकों में बड़ी मात्रा में खनिज संपदा है, वहां रहने वाले आदिवासियों के सामने विस्थापन का खतरा लगातार बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि यह संघर्ष किसी एक दिन की लड़ाई नहीं है। परिसीमन से जुड़े फैसले होने तक आदिवासी समाज को अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।

कालीचरण मुंडा बोले- राजनीतिक हिस्सेदारी घटाने की कोशिश का विरोध होगा

खूंटी सांसद कालीचरण मुंडा ने आदिवासी समाज से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के पूर्वजों ने देश और राज्य के लिए संघर्ष किया था। अब समय आ गया है कि नई परिस्थितियों में अपने संवैधानिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए समाज फिर संगठित हो।

उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों और आरक्षित सीटों में कमी नहीं होनी चाहिए। बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए।

सांसद ने कहा कि परिसीमन के खिलाफ अलग-अलग इलाकों में हो रही बैठकों और आंदोलनों को व्यापक रूप दिया जाएगा। उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने की अपील की।

प्रदीप बालमुचू ने बताया भविष्य का खतरा

प्रदीप बालमुचू ने कहा कि आदिवासी सीटों में लगातार कमी का असर आगे चलकर आरक्षण की व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि जनसंख्या के अनुपात में सीटों का पुनर्विन्यास होता रहा और आदिवासी आबादी का अनुपात घटता गया तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर हो सकता है।

बालमुचू ने कहा कि झारखंड बनने के 25 वर्ष बाद भी आदिवासी समाज को अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है।

उन्होंने मौजूदा विधानसभा में 81 में से 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होने का आंकड़ा रखते हुए कहा कि राजनीतिक भागीदारी बनाए रखने के लिए जनसंख्या अनुपात महत्वपूर्ण है।

शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा- परिसीमन भविष्य की राजनीतिक ताकत तय करेगा

मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने परिसीमन को लेकर कहा कि इसे सिर्फ लोकसभा और विधानसभा की सीटों के फेरबदल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि परिसीमन आने वाले वर्षों में यह तय करने वाला है कि आदिवासी समाज की राजनीतिक ताकत कितनी होगी और उसकी आवाज सदन में कितनी प्रभावी रहेगी।

शिल्पी नेहा तिर्की ने 2007 के परिसीमन का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय भी आदिवासी सीटों को लेकर सवाल उठे थे। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस ने उस समय परिसीमन का विरोध किया था।

उन्होंने आदिवासी आबादी घटने के लिए आदिवासी समाज को जिम्मेदार ठहराए जाने पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि जमीन छिनने, विस्थापन और पलायन जैसी परिस्थितियों ने आबादी के अनुपात को प्रभावित किया है।

उन्होंने सीएनटी, एसपीटी और पांचवीं अनुसूची जैसे प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि आदिवासी हितों की रक्षा के लिए बने इन प्रावधानों के बावजूद यदि विस्थापन हुआ है तो उसका दोष आदिवासी समाज पर नहीं डाला जा सकता।

जयपाल सिंह मुंडा का भी हुआ जिक्र

शिल्पी नेहा तिर्की ने संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा की भूमिका और आदिवासी अधिकारों को लेकर उनके सवालों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस समाज ने लंबे समय तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी झेली है, उसकी आवाज को संख्या के गणित में कमजोर करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी।

उन्होंने झारखंड में दूसरे राज्यों से रोजगार के लिए आए लोगों और समय के साथ हुए जनसांख्यिकीय बदलाव का भी जिक्र किया।

मंत्री ने कहा कि इस मुद्दे को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब गांवों से राजधानी और फिर दिल्ली तक ले जाया जाएगा।

विल्सन कोंगाड़ी ने कानूनों पर उठाए सवाल

कोलेबिरा विधायक विल्सन कोंगाड़ी ने कहा कि आदिवासी समाज को आज जो संवैधानिक अधिकार हासिल हैं, वे आसानी से नहीं मिले। इसके पीछे पूर्वजों का संघर्ष और बलिदान रहा है।

उन्होंने एमएमडीआर एक्ट में बदलाव और वन संरक्षण से जुड़े कानूनों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि इनका असर आदिवासी अधिकारों पर पड़ रहा है।

कोंगाड़ी ने भाजपा और आरएसएस पर आदिवासी हितों को कमजोर करने की कोशिश का आरोप लगाया और समाज से अपने अधिकारों को लेकर सजग रहने की अपील की।

बिरसा मुंडा के अनुयायियों ने भी दर्ज कराई मौजूदगी

महाजुटान में पश्चिमी सिंहभूम से बिरसाइयत समाज के लोग भी पहुंचे। देवगांव, बंदगांव, बड़की और बिरबा जैसे क्षेत्रों से आए इन लोगों ने कार्यक्रम में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

पारंपरिक वेशभूषा और अलग सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान के कारण बिरसाइयत समाज के लोग मैदान में आकर्षण का केंद्र भी रहे। भगवान बिरसा मुंडा के अनुयायी खुद को बिरसाइयत बताते हैं और उनके विचारों को अपने जीवन का आधार मानते हैं।

दूरदराज के जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों से पहुंचे इन लोगों की मौजूदगी ने महाजुटान को आदिवासी समाज के विभिन्न समूहों की व्यापक भागीदारी का रूप दिया।

Tribal community raises a strong voice against delimitation; announces a battle stretching from Ranchi to Delhi.

मोरहाबादी से निकला संदेश

पूरे कार्यक्रम में एक बात साफ तौर पर उभरकर सामने आई—आदिवासी समाज परिसीमन को सिर्फ सीटों के पुनर्गठन का विषय नहीं मान रहा है। नेताओं ने इसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण, जमीन, जंगल और आदिवासी पहचान से जोड़कर पेश किया।

मंच से बार-बार एकजुटता का आह्वान हुआ। नेताओं ने कहा कि अगर आने वाले परिसीमन में आदिवासी राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित होती है तो इसका विरोध गांव से लेकर विधानसभा और दिल्ली तक किया जाएगा।

बारिश के बीच मोरहाबादी मैदान में जुटी भीड़ के बीच से निकला यह संदेश अब आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में परिसीमन को एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में सामने लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

नई और ताज़ा खबरों के लिए जुड़े रहें — Drishti Now