आदिवासी एकता महाजुटान में गरजा झारखंड, परिसीमन से लेकर जल-जंगल-जमीन तक उठी आवाज; राहुल गांधी ने भेजा संदेश
मोरहाबादी मैदान में जुटे आदिवासी समाज के लोग, दयामनी बारला ने कहा- आदिवासियों के अधिकार पर चोट हुई तो आर-पार की लड़ाई होगी; सुखदेव भगत ने पढ़ा राहुल गांधी का संदेश
रांची। राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में रविवार को आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में आदिवासी समाज के अधिकार, पहचान, सम्मान, जल-जंगल-जमीन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा जोरदार तरीके से उठा। महाजुटान में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग, सामाजिक कार्यकर्ता, कांग्रेस नेता और जनप्रतिनिधि शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान परिसीमन को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा गया। वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को किसी भी कीमत पर कमजोर करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!कार्यक्रम में लोहरदगा लोकसभा सांसद सुखदेव भगत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी का संदेश पढ़कर सुनाया। राहुल गांधी ने रांची के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाने पर खेद जताया और कहा कि आदिवासी समाज के अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में वह मजबूती से उनके साथ खड़े हैं।

राहुल गांधी बोले- अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में साथ खड़ा हूं
सुखदेव भगत द्वारा पढ़े गए राहुल गांधी के संदेश में कहा गया कि उन्हें रांची में आयोजित कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाने का खेद है। हालांकि, उन्होंने भरोसा दिलाया कि अपने अधिकारों, पहचान और सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासी समाज के साथ वह मजबूती से खड़े हैं।
राहुल गांधी ने अपने संदेश में झारखंड के इतिहास और आदिवासी समाज के संघर्ष का उल्लेख किया। उन्होंने संविधान सभा में आदिवासी समाज की आवाज बुलंद करने वाले जयपाल सिंह मुंडा को याद किया। संदेश में कहा गया कि जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में आदिवासी समाज के अधिकारों को मजबूती से उठाया और उन्हें संवैधानिक सुरक्षा दिलाने के लिए संघर्ष किया।
राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस के लिए आदिवासी अधिकार सर्वोपरि हैं। संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और वन अधिकार कानून इसी सोच पर आधारित हैं कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने वाले समुदायों की अपने संसाधनों पर सबसे मजबूत आवाज हो।

विकास का मतलब विस्थापन नहीं : राहुल गांधी
राहुल गांधी ने अपने संदेश में विकास की अवधारणा को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि विकास का मतलब लोगों का विस्थापन नहीं होना चाहिए। विकास लोगों की भागीदारी, सहमति और सम्मान के साथ होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों पर यहां के लोगों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। जल, जंगल और जमीन की लड़ाई केवल संसाधनों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के सम्मान, अस्मिता और अधिकार की लड़ाई भी है।
संदेश के अंत में राहुल गांधी ने आदिवासी समाज के प्रति एकजुटता जताते हुए “जय जोहार” कहा।
दयामनी बारला बोलीं- आदिवासियत बचाने के लिए जुटे हैं
महाजुटान में सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने केंद्र सरकार और परिसीमन के मुद्दे पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आज लोग आदिवासियत को बचाने के लिए रैली में पहुंचे हैं। यह महाजुटान आदिवासी समाज को अपनी ताकत याद दिलाने का अवसर है।
उन्होंने कहा कि झारखंड के निर्माण और यहां की लड़ाई में आदिवासी समाज की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही है। अब यदि राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम करने का प्रयास किया गया तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।
दयामनी बारला ने कहा कि परिसीमन के नाम पर यदि आदिवासियों के प्रतिनिधित्व को कमजोर करने या उन्हें खत्म करने का प्रयास किया गया तो आर-पार की लड़ाई होगी। उन्होंने आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की मांग करते हुए कहा कि परिसीमन तभी स्वीकार किया जाएगा, जब आदिवासी समाज के हित और प्रतिनिधित्व सुरक्षित रहें।
उन्होंने कहा कि आदिवासियों के हक और अधिकार के लिए आखिरी दम तक लड़ाई जारी रहेगी। झारखंड की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर भी उन्होंने सरकार को चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि राज्य की खनिज संपदा और जमीन को किसी भी कीमत पर लूटने नहीं दिया जाएगा।
खनिज संपदा और जमीन के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा
महाजुटान में झारखंड की खनिज संपदा और जमीन को लेकर भी वक्ताओं ने चिंता जाहिर की। दयामनी बारला ने कहा कि झारखंड की प्राकृतिक संपदा पर सबसे पहला अधिकार यहां के लोगों का है। उन्होंने कहा कि किसी भी कानून या नीति के माध्यम से आदिवासी समाज के अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास हुआ तो उसका विरोध किया जाएगा।
उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से लाए गए संशोधन बिल का भी विरोध किया और कहा कि आदिवासी समाज अपने संसाधनों की रक्षा के लिए आंदोलन करने से पीछे नहीं हटेगा।
लक्ष्मी नारायण मुंडा ने कहा- परिसीमन की प्रक्रिया का विरोध
आदिवासी समन्वय समिति के संयोजक लक्ष्मी नारायण मुंडा ने कहा कि महाजुटान महारैली का प्रमुख उद्देश्य परिसीमन की प्रक्रिया का विरोध करना भी है। उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाओं और डैम के निर्माण के नाम पर बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी का विस्थापन हुआ है।
उन्होंने कहा कि अब आदिवासी समाज को एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी होगी। रैली के माध्यम से आदिवासी विधायकों को भी यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि आदिवासी समाज के खिलाफ किसी भी तरह की साजिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
मंच पर कांग्रेस के कई बड़े नेता मौजूद
आदिवासी एकता महाजुटान में झारखंड कांग्रेस के प्रभारी और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के स्थायी आमंत्रित सदस्य के. राजू, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, विधायक प्रदीप यादव, पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री सुबोधकांत सहाय, शहजादा अनवर, सुरेंद्र सिंह और अजय शर्मा समेत कांग्रेस के कई नेता मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान सभी प्रमुख नेता मंच पर पहुंचे। मंच का संचालन रमा खलखो ने किया। कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में महाजुटान में आदिवासी अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया।
आदिवासी परंपरा से हुआ के. राजू का स्वागत
इससे पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के स्थायी आमंत्रित सदस्य और झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू रविवार को एक दिवसीय दौरे पर रांची पहुंचे। भगवान बिरसा मुंडा एयरपोर्ट पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया।
के. राजू के स्वागत में आदिवासी परंपरा और स्थानीय सांस्कृतिक रीति-रिवाजों का विशेष ध्यान रखा गया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पारंपरिक तरीके से उनका स्वागत किया। इसके बाद के. राजू समेत कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता मोरहाबादी मैदान के लिए रवाना हुए।
इस दौरान कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री सुबोधकांत सहाय, पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, शहजादा अनवर, सुरेंद्र सिंह और अजय शर्मा समेत बड़ी संख्या में कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे।
क्या है महाजुटान का संदेश?
मोरहाबादी मैदान में हुए इस महाजुटान के जरिए आदिवासी समाज ने कई मुद्दों को एक साथ उठाया। इनमें परिसीमन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, जल-जंगल-जमीन, विस्थापन, खनिज संपदा पर अधिकार, आदिवासी पहचान और संवैधानिक अधिकार प्रमुख रहे।

















