20251226 205505

कोल्हान में आदिवासियों की जमीन जबरन छीनी जा रही है: चंपाई सोरेन ने झारखंड सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

रांची : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और जेएमएम नेता चंपाई सोरेन ने राज्य सरकार पर आदिवासी किसानों की जमीन जबरन छीनने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि पलामू में कोयला खदानों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की भरपाई के नाम पर कोल्हान क्षेत्र के आदिवासियों की जमीन को हिंदाल्को इंडस्ट्रीज को सौंपा जा रहा है। सोरेन ने इस फैसले को आदिवासी विरोधी बताते हुए कहा कि सरकार आदिवासी क्षेत्रों को आसानी से निशाना बना रही है।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

सोरेन ने अपनी बयान में कहा, “जब कोयले की खदान पलामू में पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है तो भरपाई के लिए कोल्हान के आदिवासियों की जमीन क्यों छीन रही है राज्य सरकार?” उन्होंने हालिया कैबिनेट फैसलों का जिक्र करते हुए बताया कि 24 सितंबर को कैबिनेट ने पश्चिम सिंहभूम जिले के नोवामुंडी प्रखंड में 271.92 एकड़ जमीन हिंदाल्को को वन लगाने के लिए दी थी। इसके बाद 23 दिसंबर को फिर 559 एकड़ जमीन कंपनी को सौंपी गई, जिसमें नोवामुंडी के विभिन्न गांवों की भूमि शामिल है। सोरेन ने दावा किया कि यह जमीन पलामू के चकला कोल ब्लॉक में इस्तेमाल हुई वन भूमि के बदले दी गई है, लेकिन सवाल उठाया कि पर्यावरणीय क्षति की भरपाई स्थानीय स्तर पर क्यों नहीं की जा रही?

पूर्व सीएम ने जोर देकर कहा कि उनका मकसद वनारोपण का विरोध नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि राज्य के एक कोने में हुई क्षति की भरपाई दूसरे कोने में आदिवासी क्षेत्रों से क्यों? “आदिवासी क्षेत्र की जमीन है तो छीन लो, क्या फर्क पड़ता है?” उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। प्रभावित ग्रामीणों का हवाला देते हुए सोरेन ने बताया कि ये जमीनें सालों से खेती और पशुपालन के लिए इस्तेमाल हो रही हैं। ग्रामीणों को डर है कि इससे उनकी आजीविका प्रभावित होगी। “बिना किसी विस्थापन नीति के यह जमीन छीनने की वजह क्या है? ग्राम सभा से अनुमति क्यों नहीं ली गई?” सोरेन ने सरकार से सवाल किया।

इसके अलावा, सोरेन ने सारंडा वन क्षेत्र को वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी घोषित करने के फैसले पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि वन्य जीवों की रक्षा जरूरी है, लेकिन वहां रहने वाले आदिवासियों का क्या? सारंडा में 50 राजस्व ग्राम और 10 वन ग्राम हैं, जहां 75,000 से ज्यादा लोग रहते हैं। यहां आदिवासियों के देवस्थल, सरना स्थल और सांस्कृतिक स्थल हैं, जो उनकी पहचान का हिस्सा हैं। “जंगल से मिलने वाले लघु वनोपज और जड़ी-बूटियां आदिवासियों की आजीविका का आधार हैं। ऐसे में सैंक्चुअरी घोषित करना आदिवासी हितों को नजरअंदाज करना है,” सोरेन ने कहा।

सोरेन ने सरकार की दोहरी नीति पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सारंडा में चल रही खदानों को बचाने के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट गई और सफल हुई, लेकिन आदिवासियों के लिए एक शब्द नहीं बोला। “यह कैसी अबुआ सरकार है?” उन्होंने पूछा। पश्चिम सिंहभूम में आदिवासी स्वशासन में हस्तक्षेप, लाठीचार्ज और जेल भेजने जैसे कदमों को अत्याचार बताते हुए सोरेन ने कहा कि इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

उन्होंने आदिवासियों की समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि शहरों में धर्मांतरण, गांवों में घुसपैठिए और जंगलों में उजाड़ने की साजिश से आदिवासी कहां जाएं? “उनके पास अपने अस्तित्व को बचाने के लिए क्या विकल्प है? वीर पोटो हो की धरती कोल्हान से, फिर एक बार उलगुलान होगा,” सोरेन ने चेतावनी दी।

सोरेन ने पेसा अधिनियम पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि झारखंड पहला राज्य है जहां कैबिनेट से पास होने के बाद अधिनियम गायब हो गया। “जन-प्रतिनिधियों और मीडिया को ड्राफ्ट नहीं मिला। सरकार क्या छिपाना चाहती है?” उन्होंने पूछा। विभागीय सचिव के बयान का हवाला देते हुए कहा कि अगर पेसा से पंचायत चुनावों पर असर नहीं पड़ता, तो यह कैसा अधिनियम है? “पेसा का मकसद आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन को मजबूत करना है। शेड्यूल एरिया में चुनाव क्यों?” सोरेन ने कहा कि यह सिर्फ हाई कोर्ट को दिखाने के लिए हो सकता है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब झारखंड में आदिवासी अधिकारों और भूमि अधिग्रहण को लेकर बहस तेज है। सरकार की ओर से अभी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। सोरेन के इस बयान से राज्य में राजनीतिक हलचल बढ़ सकती है, खासकर आदिवासी बहुल इलाकों में।

Share via
Share via