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सस्पेंसन……आखिर यह कैसा न्याय ? क्या सस्पेंड कर देना पीड़ित परिवार के लिए न्याय है ?

सस्पेंसन……आखिर यह कैसा न्याय ? क्या सस्पेंड कर देना पीड़ित परिवार के लिए न्याय है ?

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श्रवण पांडेय /पलामू

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पलामू थाना प्रभारी के कथित पिटाई से एक कैदी की मौत का मामला तूल पकड़ रहा है । रिम्स में कैदी महफूज अहमद की मौत के बाद इस अधिकारी को पलामू के SP रिष्मा रमेशन ने सस्पेंड कर दिया है । लेकिन सवाल यह उठ रहा है की क्या सिर्फ सस्पेंड कर देना ही न्याय है ?हत्या के मामले में तो बेल मिलना मुश्किल होता है ऐसे में इस थानेदार पर कम से न्यायिक जांच या विभागीय कार्यवाही तो जरूर होनी चाहिए।

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वैसे बाबूलाल मरांडी ने इस मामले को विधानसभा में उठाया, जिसके बाद पलामू एसपी रिष्मा रमेशन ने संबंधित थानेदार को निलंबित किया। विधानसभा में मामले की गंभीरता को देखते हुए, यह संवेदनशील मुद्दा चर्चा में रहा।

घटना का विवरण

रांची में एक कैदी की मौत की खबर सामने आई , जिसे कथित तौर पर पलामू थानेदार द्वारा पिटाई के बाद इलाज के लिए रिम्स लाया गया। जहां उसकी मौत हो गयी। इस मामले को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने विधानसभा में उठाया , जिसके बाद पलामू के पुलिस अधीक्षक (एसपी) रिष्मा किरमेशन ने थानेदार को निलंबित कर दिया। यह कार्रवाई बजट सत्र के दौरान मामला कि उठाने पर की गई थी।

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सदन में इस घटना में मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगा, और बाबूलाल मरांडी ने विधानसभा में पीड़ित परिवार को मुआवजा और दोषी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। डीजीपी अनुराग गुप्ता ने पलामू एसपी को जांच के निर्देश दिए, जिसके आधार पर थानेदार को निलंबित किया गया।

बाबूलाल मरांडी की भूमिका

बाबूलाल मरांडी, जो विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं उन्होंने इस मामले को विधानसभा में उठाकर इसे सार्वजनिक मंच पर लाया। उनकी मांग थी कि पीड़ित को उचित न्याय मिले और दोषी पुलिस अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। उन्होंने सरकार की जवाबदेही और कानून-व्यवस्था पर सवाल भी उठाये।

पलामू एसपी रिष्मा रमेशन की कार्रवाई

रिष्मा रमेशन, जो पलामू की पहली महिला एसपी हैं और 2017 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं, उन्होंने मामले में त्वरित कार्रवाई की। उन्हें डीजीपी के निर्देश के बाद जांच करने का आदेश मिला, और उन्होंने नवाबाजार पुलिस स्टेशन के प्रभारी चिंटू कुमार को निलंबित किया।

कानूनी और मानवाधिकार पहलू

कानून के जानकारों के अनुसार यह मामला मानवाधिकार उल्लंघन का गंभीर उदाहरण है, यह घटना पुलिस हिरासत में मौत और यातना के मुद्दे को फिर से उजागर करती है, जो एक संवेदनशील और विवादास्पद विषय है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है की कैदी की मौत का कारण क्या है । पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट हो पाएगा कि उसकी मौत कैसे हुई ? लेकिन फिर भी अगर थाने में पिटाई से उसकी स्थिति गंभीर हुई जिससे बाद में उसकी मौत हो गयी। तब सिर्फ निलंबन की कार्रवाई कैदी के परिवारवालों के लिए न्याय संगत नहीं लगता।जानकार बताते हैं की कम से कम थाना प्रभारी पर विभागीय करवाई जरुर होनी चाहिए।

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