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चित्रा कोल माइंस: डस्ट का कहर, ईसीएल की लापरवाही, लोगों की सांसें दांव पर

चित्रा कोल माइंस: डस्ट का कहर, ईसीएल की लापरवाही, लोगों की सांसें दांव पर

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देवघर से पंकज पांडे की रिपोर्ट

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देवघर के सारठ स्थित चित्रा कोल माइंस में डस्ट उड़ने का एक गंभीर मामला सामने आया है, जो स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य और जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। आरोप है की  ईसीएल (ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) प्रबंधन की लापरवाही इस समस्या का प्रमुख कारण है। कोयले के परिवहन के दौरान नियमों का पालन न करना, जैसे ट्रकों पर त्रिपाल का उपयोग न करना और पानी के छिड़काव जैसी बुनियादी प्रक्रियाओं में ढिलाई, स्थिति को और बदतर बना रही है।
स्थानीय श्याम देव मंडल के साथ साथ गांव के तमाम लोगो की शिकायतें  हैं। डस्ट के कारण सांस संबंधी बीमारियों, जैसे अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस, और अन्य श्वसन तंत्र के रोगों का खतरा बढ़ रहा है, जो लंबे समय में लोगों की औसत आयु को प्रभावित कर सकता है। यह चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ईसीएल प्रबंधन को पानी के टैंकर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, फिर भी इसका प्रभावी उपयोग नहीं हो रहा।

आइए, इसे विभिन्न बिंदुओं के आधार पर विस्तार से देखते हैं:
1. समस्या का मूल और उसका स्वरूप
चित्रा कोल माइंस, जो ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) के अधीन संचालित होती है, एक महत्वपूर्ण कोयला खनन क्षेत्र है। यहां से प्रतिदिन सैकड़ों ट्रक कोयला लेकर निकलते हैं, जो विभिन्न गंतव्य स्थानों तक पहुंचाया जाता है। लेकिन इस परिवहन प्रक्रिया में डस्ट (कोयले की धूल) का उड़ना एक बड़ी समस्या बन गया है। यह डस्ट न केवल खदान के आसपास के क्षेत्र में फैलता है, बल्कि परिवहन मार्गों पर भी हवा में फैलकर स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का कारण बनता है।
डस्ट का स्रोत: कोयले की खुली खदानों से निकलने वाली धूल और ट्रकों पर लदे कोयले से हवा में उड़ने वाली बारीक कणिकाएं।
प्रभावित क्षेत्र: खदान के आसपास के गांव और बस्तियां, जहां लोग रोजमर्रा की जिंदगी में इस प्रदूषण का सामना कर रहे हैं।
मौसमी प्रभाव: हवा के साथ डस्ट का फैलाव गर्मी और सर्दी में ज्यादा होता है, खासकर जब हवा तेज चलती है या बारिश की कमी होती है।
2. स्वास्थ्य पर प्रभाव
डॉक्टर के मुताबिक डस्ट उड़ने की समस्या का सबसे गंभीर असर स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। कोयले की धूल में मौजूद बारीक कण (जैसे PM2.5 और PM10) सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचते हैं, जिससे कई बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती है।
श्वसन संबंधी रोग: अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), और ब्रॉन्काइटिस जैसी बीमारियां आम हो सकती हैं।
फेफड़ों का कैंसर: लंबे समय तक कोयले की धूल के संपर्क में रहने से फेफड़ों में कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है, क्योंकि इसमें सिलिका और अन्य हानिकारक रसायन मौजूद होते हैं।
अन्य प्रभाव: आंखों में जलन, त्वचा की समस्याएं, और बच्चों व बुजुर्गों में कमजोर प्रतिरक्षा के कारण बार-बार बीमार पड़ना।
लंबी अवधि का जोखिम: जैसा कि स्थानीय लोगों ने कहा, यदि यह समस्या अनियंत्रित रही, तो औसत आयु घटकर 50 साल तक हो सकती है, जो एक चेतावनी भरा अनुमान है।
3. ईसीएल प्रबंधन की लापरवाही
ग्रामीणों का आरोप है कि ईसीएल प्रबंधन की ओर से इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं दिख रहा, जबकि उनके पास संसाधन और अधिकार दोनों मौजूद हैं।
नियमों का उल्लंघन: आरोप है की कोयले के परिवहन के दौरान ट्रकों पर त्रिपाल बांधने का नियम है, ताकि डस्ट न उड़े। लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा।
पानी के टैंकरों का अप्रभावी उपयोग: प्रबंधन को प्रतिदिन कई टैंकर पानी उपलब्ध कराया जाता है, जिसका इस्तेमाल खदान और सड़कों पर छिड़काव के लिए होना चाहिए। लेकिन यह नियमित या पर्याप्त रूप से नहीं हो रहा।
ठेकेदारों पर निगरानी की कमी: आप यह भी है कि डस्ट नियंत्रण का जिम्मा जिन ठेकेदारों को दिया गया है, उनकी निगरानी नहीं हो रही।  उनके काम में लापरवाही बरती जा रही है।
शिकायतों पर ध्यान न देना: स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि बार-बार इस मुद्दे को उठा रहे हैं, लेकिन प्रबंधन की ओर से कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा।
4. स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया
स्थानीय लोग इस समस्या से त्रस्त हैं और इसे लेकर अपनी आवाज उठा रहे हैं। जनप्रतिनिधि श्याम देव मंडल ने भी इस ओर ध्यान दिलाया है।
लोगों की शिकायत: डस्ट की वजह से रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। घरों में धूल जम रही है, सांस लेना मुश्किल हो रहा है, और बच्चे व बुजुर्ग खास तौर पर प्रभावित हो रहे हैं।
लोगों की परेशानी लंबे वक्त में हो सकते हैं बीमार: लोगों का कहना है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो स्वास्थ्य संकट गहरा सकता है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।
5. क्या कहता है नियम
नियम के मुताबिक ट्रकों पर त्रिपाल अनिवार्य है प्रत्येक ट्रक की जांच के लिए एक चेकपॉइंट होनी चाहिए, जहां बिना त्रिपाल के ट्रकों को रोक दिया जाए।
पानी का नियमित छिड़काव: नियम के मुताबिक खदान क्षेत्र, परिवहन मार्गों और आसपास की बस्तियों में दिन में कम से कम दो बार पानी का छिड़काव होना चाहिए।

स्वास्थ्य सुविधाएं: कोलियरी के आसपास के लोगों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच शिविर और प्रभावित लोगों के लिए मुफ्त इलाज की व्यवस्था होनी चाहिए

जाहिर है चित्रा कोल माइंस में डस्ट उड़ने की समस्या एक गंभीर संकट है, जो लापरवाही और जवाबदेही की कमी के कारण बढ़ रहा है। यह सिर्फ एक तकनीकी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लोगों के जीवन और भविष्य से जुड़ा सवाल है। ईसीएल प्रबंधन को चाहिए कि वह तत्काल प्रभाव से नियमों का पालन करे, संसाधनों का सही उपयोग करे, और स्थानीय लोगों की शिकायतों को सुने।

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