चितरा कोलयरी ब्लास्टिंग हादसा: तुलसीडाबर गाँव में दहशत, ईसीएल की लापरवाही उजागर

चितरा कोलयरी ब्लास्टिंग हादसा: तुलसीडाबर गाँव में दहशत, ईसीएल की लापरवाही उजागर

देवघर से पंकज पांडेय की रिपोर्ट

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झारखंड के देवघर जिला के चितरा कोलयरी के तुलसीडाबर गाँव में ब्लास्टिंग से जुड़ी घटनाएँ  एक गंभीर खतरे का संकेत दे रही हैं, गांव के बगल में ब्लास्टिंग यहाँ के ग्रामीणों के जीवन को दहशत, अनिश्चितता और असुरक्षा की गहरी खाई में धकेल रही हैं। यहाँ खबर मार्मिक है  यह  ख़बर एक ऐसे समुदाय की पीड़ा को उजागर करती है, जो अपनी जमीन, घर और भविष्य बचाने की जद्दोजहद में है, लेकिन उसकी आवाज़ को बार-बार अनसुना किया जा रहा है। यहाँ की स्थिति को विस्तार से समझने के लिए आइए, घटना, उसकी पृष्ठभूमि, ग्रामीणों की व्यथा, और प्रबंधन की प्रतिक्रिया को गहराई से देखें।
घटना का विवरण
तुलसीडाबर गाँव, जो चितरा कोलयरी के ओपनकास्ट खनन क्षेत्र से महज 15 मीटर की दूरी पर बसा है, हाल ही में एक खतरनाक हादसे का गवाह बना है। कोलयरी में हुई हैवी ब्लास्टिंग के दौरान पत्थर उड़कर गाँव के घरों में जा गिरे।  ऐसी घटना लगातार चौथी बार हुई, जब ब्लास्टिंग के कारण पत्थर और मलबा ग्रामीणों के घरों तक पहुँचा। इस बार, जब पत्थर एक घर में गिरा, बच्चे घर के अंदर पढ़ाई कर रहे थे। उड़ते धूल और धुएँ के गुबार ने दृश्यता को शून्य कर दिया, जिससे गाँव में अफरा-तफरी मच गई। हालांकि इससे कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन यह घटना ग्रामीणों के लिए एक और चेतावनी थी कि उनकी जान हर पल खतरे में है।

चितरा कोलयरी ब्लास्टिंग हादसा: तुलसीडाबर गाँव में दहशत, ईसीएल की लापरवाही उजागर

हैवी ब्लास्टिंग से घर के खपड़े का हाल

ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी तीन बार ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं, और हर बार ईसीएल (ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) प्रबंधन को लिखित शिकायत दी गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके अलावा, ब्लास्टिंग और उत्खनन से होने वाला कंपन घरों की दीवारों को हिला देता है, छतों से ईंट और बालू गिरने लगता है, और उड़ता कोयले का धूल (डस्ट) साँस लेना तक मुश्किल कर देता है। पेयजल की कमी और स्वास्थ्य समस्याएँ भी गाँववासियों के लिए रोज़मर्रा की चुनौती बन चुकी हैं।
तुलसीडाबर गाँव की स्थिति
तुलसीडाबर गाँव की भौगोलिक स्थिति इसे और भी असुरक्षित बनाती है। यह गाँव कोलयरी के इतने करीब है कि ब्लास्टिंग और मशीनों की आवाज़ें ग्रामीणों के लिए सामान्य हो चुकी हैं, लेकिन इसके साथ ही हर पल अनहोनी का डर भी बना रहता है। गाँव में ज्यादातर आदिवासी और दलित समुदाय के लोग रहते हैं, जो अपनी जमीन और आजीविका के लिए खनन कंपनी पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती और छोटे-मोटे कामों से गुज़ारा करते हैं। लेकिन कोलयरी के विस्तार ने उनकी ज़मीन को निगलना शुरू कर दिया है, और बदले में न तो उचित मुआवजा दिया जा रहा है और न ही पुनर्वास की कोई ठोस योजना सामने आई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि ईसीएल प्रबंधन उनकी बस्ती को उजाड़ने पर तुला है। ब्लास्टिंग और उत्खनन का काम गाँव के इतने करीब हो रहा है कि घरों में दरारें पड़ रही हैं, और हर बार ब्लास्टिंग के बाद धूल का गुबार गाँव को ढक लेता है। यह धूल न केवल फसलों को नुकसान पहुँचाती है, बल्कि बच्चों और बुजुर्गों में साँस की बीमारियाँ भी बढ़ा रही है। पेयजल की समस्या भी गंभीर है, क्योंकि खनन कार्यों ने स्थानीय जलस्रोतों को प्रदूषित कर दिया है।

चितरा कोलयरी ब्लास्टिंग हादसा: तुलसीडाबर गाँव में दहशत, ईसीएल की लापरवाही उजागर

मीटिंग करते ग्रामीण 
ग्रामीणों की व्यथा
तुलसीडाबर के ग्रामीण दहशत और निराशा के बीच जी रहे हैं। उनकी बातों में गुस्सा, डर और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता साफ झलकती है। यहाँ कुछ ग्रामीणों और नेताओं की बातें हैं, जो इस मार्मिक स्थिति को और गहराई से दर्शाती हैं:
आदिनाथ मरांडी (ग्रामीण):
“बुधवार को ब्लास्टिंग हुई, और पत्थर उड़कर हमारे घर में आ गिरा। बच्चे पढ़ रहे थे, भगवान ने बचा लिया। इतना धूल उड़ा कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। यह पहली बार नहीं हुआ, पहले भी तीन बार ऐसा हो चुका है। हमने प्रबंधन को लिखित शिकायत दी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं। अब बैठक में प्रबंधन ने सुरक्षा का वादा किया है, लेकिन भरोसा कैसे करें? हर बार वही आश्वासन, और फिर वही घटना।”
नेपाल मरांडी (ग्रामीण):
“मेरी जमीन दबाई जा रही है, न मुआवजा मिला, न दूसरी जमीन। हम क्या खाएँगे? 2.5 डिसमिल जमीन में क्या होगा? मेरे बच्चों का भविष्य क्या होगा? रास्ता तक नहीं बचा, गाड़ी कहाँ से निकलेगी? ईसीएल को हमारी चिंता नहीं, बस अपनी खदान चाहिए। हमें उसी तरह की जमीन चाहिए, जो हमारी थी।”
पशुपति कोल (यूनाइटेड कोल वर्कर यूनियन):
“यह प्रबंधन की पूरी गलती है। ब्लास्टिंग में लापरवाही बरती जा रही है। हम माँग करते हैं कि ऐसी घटनाएँ न हों, और विस्थापन की समस्या का समाधान हो। यहाँ के आदिवासी और गरीब लोग जुल्म झेल रहे हैं। मुआवजा, पुनर्वास और बुनियादी सुविधाएँ देना प्रबंधन की जिम्मेदारी है।”
मनोज सुभद्रा यादव (झामुमो नेता):
“यहाँ का असल मसला विस्थापन का है। ग्रामीणों को न मुआवजा मिला, न रहने की जगह। 2023 में भी बैठक हुई, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ईसीएल सिर्फ खानापूर्ति कर रहा है। यह आदिवासी-दलित गाँव है, क्या इसलिए इनके अधिकारों का हनन हो रहा है? हम 21 अप्रैल को विरोध प्रदर्शन करेंगे।”

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इतने बड़े बड़े पत्थर उड़ते है

सीएल प्रबंधन की प्रतिक्रिया
एसपी माइंस चितरा के जीएम ए.के. आनंद ने इस घटना को “छोटी-मोटी” बताते हुए कहा कि ब्लास्टिंग के दौरान एक फ्लायरॉक (उड़ता पत्थर) गाँव में गिरा था। उन्होंने दावा किया कि इसके बाद तुरंत एक बैठक बुलाई गई, जिसमें ग्रामीणों की माँगों पर चर्चा हुई। उनके अनुसार:
ब्लास्टिंग के लिए अब सख्त सावधानियाँ बरती जाएँगी।
ब्लास्टिंग के समय अधिकारी मौके पर मौजूद रहेंगे।
ग्रामीणों को विस्फोट से पहले सायरन और अन्य तरीकों से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जाएगा।
विस्थापन को लेकर जल्द ही एक और बैठक होगी, और ग्रामीणों के साथ “सौहार्दपूर्ण” तरीके से काम किया जाएगा।
ग्रामीणों की अनसुनी पुकार
तुलसीडाबर के ग्रामीणों की कहानी केवल एक गाँव की कहानी नहीं है; यह उन अनगिनत समुदायों की कहानी है, जो विकास की आड़ में अपनी जमीन, संस्कृति और पहचान खो रहे हैं। हर ब्लास्टिंग के साथ उनके घर हिलते हैं, लेकिन उनकी आवाज़ प्रबंधन की बैठकों और आश्वासनों की भूलभुलैया में दब जाती है। बच्चे जब किताबें खोलते हैं, तो बाहर धमाकों की आवाज़ गूँज रही होती है। माँएँ अपने बच्चों को सीने से लगाए हर पल डर में जीती हैं कि कब कोई पत्थर उनके आँगन में आ गिरे।
नेपाल मरांडी का सवाल दिल को छू जाता है: “हम नहीं रहे, तो मेरा बेटा क्या खाएगा?” यह सवाल केवल जमीन या मुआवजे का नहीं, बल्कि एक पूरे समुदाय के अस्तित्व का है। ग्रामीणों का गुस्सा और निराशा तब और बढ़ जाती है, जब उन्हें बार-बार वही खोखले वादे सुनने पड़ते हैं। 21 अप्रैल को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन उनकी उस उम्मीद का प्रतीक है, जो अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

जाहिर है की चितरा कोलयरी की यह घटना एक चेतावनी है कि विकास का रास्ता तब तक अधूरा है, जब तक वह उन लोगों को साथ नहीं लेता, जिनकी जमीन और मेहनत पर वह टिका है। तुलसीडाबर के ग्रामीण न तो अपनी जमीन छोड़ना चाहते हैं और न ही अपनी गरिमा। वे केवल इतना चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए, उनकी जान की कीमत समझी जाए, और उनके बच्चों को एक सुरक्षित भविष्य मिले। लेकिन जब तक ईसीएल और प्रशासन उनकी पुकार को गंभीरता से नहीं लेते, यह डर बना रहेगा कि अगली ब्लास्टिंग सिर्फ पत्थर ही नहीं, बल्कि एक पूरे गाँव के सपनों को चूर-चूर कर देगी।

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