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ट्रम्प का टैरिफ बम…राजनैतिक जीत या फिर आर्थिक चुनौती ?

डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में चीन के खिलाफ टैरिफ (आयात शुल्क) को एक प्रमुख हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है, जिसे कई लोग “टैरिफ बम” कहते हैं। यह नीति न केवल आर्थिक बल्कि सामरिक

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दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। आइए इसे संक्षेप में समझें:

ट्रम्प का टैरिफ बम टैरिफ की शुरुआत :

ट्रम्प ने 2025 में चीन से आयातित सामानों पर टैरिफ को बढ़ाया, जो कुछ मामलों में 20% से शुरू होकर 145% तक पहुंच गया। यह कदम उनके पहले कार्यकाल की नीतियों का विस्तार है, जब उन्होंने चीन के साथ व्यापार युद्ध शुरू किया था। इसका उद्देश्य अमेरिकी विनिर्माण को बढ़ावा देना, नौकरियों को वापस लाना और व्यापार घाटे को कम करना बताया गया। साथ ही, ट्रम्प ने फेंटानिल जैसे ड्रग्स की तस्करी रोकने के लिए चीन पर दबाव बनाने की बात कही।

चीन पर प्रभाव :

चीन दुनिया की सबसे बड़ी विनिर्माण शक्ति है, और उसका अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष (2024 में $440 बिलियन आयात बनाम $145 बिलियन निर्यात) रहा है। टैरिफ के कारण चीनी सामानों की कीमतें बढ़ीं, जिससे अमेरिकी उपभोक्ताओं पर असर पड़ा। खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स, और कपड़े जैसे उत्पाद महंगे हो गए। हालांकि, चीन ने पहले के टैरिफ से सबक लिया और अपनी रणनीति बदली। उसने वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों के जरिए अपने सामान को अमेरिका भेजने की वैकल्पिक व्यवस्था की।

चीन का जवाब :

चीन ने भी जवाबी टैरिफ लगाए, जो 34% से बढ़कर 84% और फिर 125% तक पहुंच गए। इनका निशाना अमेरिकी कृषि उत्पाद (मांस, अनाज, कपास), ऊर्जा (कोयला, LNG), और तकनीकी कंपनियां रहीं। चीन ने 11 अमेरिकी कंपनियों को “अविश्वसनीय इकाइयों” की सूची में डाला, जिससे उन्हें चीनी बाजार में कारोबार करने में मुश्किल हुई। साथ ही, दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (rare earth elements) के निर्यात पर नियंत्रण और अमेरिकी मेडिकल इमेजिंग उपकरणों की जांच शुरू की। चीनी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका को “आर्थिक धमकी” देने वाला बताया और “अंत तक लड़ने” की बात कही।

व्यापक प्रभाव :

वैश्विक व्यापार युद्ध: ट्रम्प के टैरिफ ने न केवल चीन, बल्कि कनाडा, मैक्सिको, और यूरोपीय संघ जैसे अन्य व्यापारिक साझेदारों को भी प्रभावित किया। जवाबी टैरिफ ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया। अमेरिकी अर्थव्यवस्था: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि टैरिफ से अमेरिकी उपभोक्ताओं पर $1900 प्रति परिवार का अतिरिक्त बोझ पड़ा। इससे मुद्रास्फीति बढ़ी और मंदी की आशंका जताई गई।

चीन की रणनीति : 

चीन ने टैरिफ युद्ध को लंबा खींचने की रणनीति अपनाई, यह मानते हुए कि उसकी अर्थव्यवस्था अब अमेरिका पर कम निर्भर है। उसने घरेलू तकनीक (जैसे चिप्स) और नवीकरणीय ऊर्जा (सौर पैनल) में निवेश बढ़ाया।

ट्रम्प की रणनीति: रणनीति या जोखिम?

रणनीति : ट्रम्प का दावा है कि टैरिफ से अमेरिका को “आर्थिक संप्रभुता” मिलेगी और चीन जैसे “धोखेबाज” देशों को सबक सिखाया जाएगा। उनके सलाहकार, जैसे पीटर नवारो, इसे घरेलू उद्योगों के लिए जरूरी बताते हैं।

जोखिम :कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह नीति उलटी पड़ सकती है। टैरिफ से कीमतें बढ़ेंगी, वैश्विक मंदी का खतरा बढ़ेगा, और अमेरिकी निर्यातकों (खासकर किसानों) को नुकसान होगा। 23 नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्रियों ने ट्रम्प की नीतियों को “उच्च कीमतों और असमानता” बढ़ाने वाला बताया।

अब आगे क्या?

ट्रम्प ने फिलहाल (अप्रैल 2025) अन्य देशों पर टैरिफ को 90 दिनों के लिए नरम किया, लेकिन चीन पर और सख्ती की। इससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि “टैरिफ युद्ध में कोई विजेता नहीं होता,” लेकिन वह पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते। दोनों पक्षों की जिद से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। अगर ट्रम्प और शी के बीच बातचीत होती है, तो शायद कुछ समझौता हो, लेकिन अभी दोनों अपनी-अपनी जिद पर अड़े दिखाई दे रहे हैं।

निष्कर्ष :

ट्रम्प का “टैरिफ बम” चीन के साथ एक बड़े आर्थिक टकराव का हिस्सा है, जो दोनों देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम भरा है। चीन ने इस बार पहले से बेहतर तैयारी की है, लेकिन लंबे समय तक टैरिफ युद्ध दोनों पक्षों को नुकसान पहुंचा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह नीति ट्रम्प के लिए राजनीतिक जीत लाती है या फिर भविष्य में उनकी आर्थिक चुनौतियां बढ़ाएंगी?

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