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क्या आजसू पार्टी में परिवारवाद हावी ! क्यों होने लगा कुशवाहा-कुड़मी नेताओं का पार्टी से मोहभंग ? आइये टटोलते है ।

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क्या आजसू पार्टी में परिवारवाद हावी ! क्यों होने लगा कुशवाहा-कुड़मी नेताओं का पार्टी से मोहभंग ? आइये टटोलते है ।


रांची, 02 अक्टूबर : “सबका साथ, सबका विकास” को लेकर चलने का दावा करने वाली पार्टी  ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) पार्टी अपने ही सिद्धांतों से भटकती नजर आ रही है!  पार्टी पर परिवारवाद और सामाजिक समीकरणों की अनदेखी के गंभीर आरोप लग रहे हैं, जिसके चलते कुशवाहा और कुड़मी समाज के कई कद्दावर नेता पार्टी में आए और टिकट न मिलने या गठबंधन की ढुलमुल नीतियों के कारण छोड़ गए। इसका खामियाजा आज भी पार्टी के ईमानदार कार्यकर्ता भुगत रहे हैं, और आजसू राजनीतिक हाशिए पर सिमटती जा रही है।

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कुशवाहा समाज के दिग्गजों का सफर: उम्मीद से निराशा तककुशवाहा समाज के चार प्रभावशाली नेताओं—लोकनाथ महतो, देवीदयाल कुशवाहा, शिवपूजन कुशवाहा और जयप्रकाश वर्मा—के आजसू में प्रवेश और बाहर निकलने की कहानी पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाती है।

लोकनाथ महतो और देवीदयाल कुशवाहा: 26 अक्टूबर 2013 को बीजेपी छोड़कर आजसू में शामिल हुए दोनों नेताओं ने पार्टी को मजबूत करने की कोशिश की। लोकनाथ महतो, जो बड़कागांव से तीन बार विधायक रह चुके थे, ने 2014 के लोकसभा चुनाव में हजारीबाग से किस्मत आजमाई, लेकिन बुरी तरह हारे। पार्टी ने 2014 के विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट देने के बजाय सुप्रीमो सुदेश महतो के मौसा रोशन लाल चौधरी को मैदान में उतारा, जो हार गए। वहीं, पूर्व विधायक और झारखंड के कृषि मंत्री रह चुके देवीदयाल कुशवाहा को भी आजसू में कोई राजनीतिक भविष्य नजर नहीं आया। नतीजतन, दोनों नेता 2016 में बीजेपी में लौट गए।

शिवपूजन कुशवाहा: पलामू प्रमंडल के कद्दावर नेता और 2014-19 तक बसपा से हुसैनाबाद विधायक रहे शिवपूजन 2019 में आजसू में शामिल हुए। गठबंधन की संभावना के बीच अंतिम समय में नामांकन की तारीख को गठबंधन टूट गया, और वे आजसू से लड़े लेकिन हार गए। 2024 के चुनाव में भी गठबंधन को लेकर पार्टी की अस्पष्ट नीति ने उन्हें फिर धोखा दिया। अंतिम समय तक टिकट का आश्वासन मिलने के बावजूद हुसैनाबाद सीट बीजेपी को चली गई। बसपा से किसी तरह टिकट हासिल कर लड़े, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। अब उनका राजनीतिक भविष्य संघर्षमय है।

जयप्रकाश वर्मा: 2006 के कोडरमा लोकसभा उपचुनाव में आजसू से लड़े जयप्रकाश वर्मा कुशवाहा समाज के बड़े चेहरे थे। उनके पिता जगदीश प्रसाद कुशवाहा जनसंघ के दिग्गज थे, और चाचा रीतलाल प्रसाद वर्मा पांच बार सांसद रहे। इसके बावजूद, जयप्रकाश की हार और पार्टी की नीतियों ने उन्हें भी आजसू से दूर कर दिया।

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कुड़मी समाज का भी यही हालकुशवाहा समाज के साथ-साथ कुड़मी समाज के कई बड़े नाम—शैलेंद्र महतो, राजकिशोर महतो, ललित महतो, आस्तिक महतो, विश्वरंजन महतो, खगेन महतो, अनिल महतो (टाइगर) —आजसू में शामिल हुए, लेकिन परिवारवाद और अवसरों की कमी के कारण पार्टी छोड़ गए। इन नेताओं का जाना आजसू के लिए बड़ा नुकसान साबित हुआ, क्योंकि कुड़मी समाज झारखंड में सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है।

परिवारवाद और गठबंधन की नीति ने तोड़ी कमर – 2014 के लोकसभा चुनाव में आजसू के सभी प्रत्याशियों, जिसमें सुप्रीमो सुदेश महतो भी शामिल थे, की जमानत जब्त हो गई थी। इसके बावजूद, पार्टी ने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने के बजाय परिवारवाद को बढ़ावा दिया। लोकनाथ महतो जैसे अनुभवी नेता को दरकिनार कर रिश्तेदारों को टिकट देना इसका उदाहरण है। गठबंधन को लेकर अस्पष्ट नीतियों ने भी नेताओं का भरोसा तोड़ा। शिवपूजन कुशवाहा जैसे नेताओं को अंतिम समय तक आश्वासन देकर धोखा दिया गया, जिससे पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।आजसू की हाशिए पर स्थितिइन नीतियों का नतीजा यह है कि आजसू आज झारखंड की राजनीति में हाशिए पर है।

कुशवाहा और कुड़मी समाज के इन नेताओं का साथ होता, तो पार्टी का वोटबैंक और सामाजिक आधार मजबूत हो सकता था। लेकिन परिवारवाद और गठबंधन की गलत रणनीतियों ने पार्टी को कमजोर कर दिया। आज भी पार्टी के ईमानदार कार्यकर्ता इसकी कीमत चुका रहे हैं।

जाहिर है आजसू को अगर अपनी खोई साख वापस लानी है, तो उसे सामाजिक समीकरणों का सम्मान करना होगा और परिवारवाद से ऊपर उठकर योग्य नेताओं को अवसर देना होगा। अब देखना है की क्या पार्टी इस सबक को समय रहते सीख पाएगी, या हाशिए पर ही बनी रहेगी?

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