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पद्म भूषण से सम्मानित हुए दिशोम गुरु शिबू सोरेन: झामुमो ने भारत रत्न की मांग को जारी रखने का ऐलान

रांची : झारखंड आंदोलन के जनक और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक दिशोम गुरु शिबू सोरेन को भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया है। गणतंत्र दिवस 2026 के अवसर पर जारी पद्म पुरस्कारों की सूची में लोक कल्याण और सामाजिक योगदान के क्षेत्र में गुरुजी का नाम posthumous रूप से शामिल किया गया है। इस फैसले का झामुमो सहित पूरे झारखंड में स्वागत किया जा रहा है, लेकिन साथ ही यह मांग भी जोर-शोर से उठ रही है कि गुरुजी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाए।

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शिबू सोरेन का जीवन: संघर्ष से राज्य निर्माण तक

11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने किशोरावस्था में ही पिता की हत्या के बाद जीवन की कठिन चुनौतियों का सामना किया। महाजनी शोषण, जमीन की लूट और सामाजिक अन्याय के खिलाफ उन्होंने आंदोलन खड़ा किया। जल, जंगल और जमीन की रक्षा उनके जीवन का मूल मंत्र रहा। नशा मुक्ति, शिक्षा और आदिवासी-मूलवासी समाज की जागरूकता के लिए उनके प्रयासों ने लाखों लोगों को नई दिशा दी।

चार दशकों तक झारखंड आंदोलन के चेहरा रहे गुरुजी तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, दुमका से आठ बार लोकसभा सांसद चुने गए, राज्यसभा सदस्य रहे और केंद्र में मंत्री के रूप में भी सेवाएं दीं। 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवंत है।

झामुमो का स्वागत और भारत रत्न की मांग

झामुमो के महासचिव विनोद पांडेय ने केंद्र सरकार के इस निर्णय का हार्दिक स्वागत करते हुए कहा, “गुरुजी भारतीय मिट्टी के सच्चे सपूत थे, जिन्होंने हाशिए पर खड़े आदिवासी समाज को मुख्यधारा में आवाज दी। पद्म भूषण सम्मान सराहनीय है, लेकिन गुरुजी के योगदान को देखते हुए भारत रत्न की मांग आगे भी जारी रहेगी।”

उल्लेखनीय है कि झारखंड विधानसभा ने पहले ही सर्वसम्मति से गुरुजी को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था। कई कार्यकर्ता और राजनीतिक दल भी इस मांग को दोहरा रहे हैं।

आदिवासी समाज की आवाज: भारत रत्न का हकदार कौन?

आदरणीय शिबू सोरेन को कई लोग “भारत के अनमोल रत्न” मानते हैं। उनका संघर्ष न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश के आदिवासी-मूलवासी समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है। एक सवाल अक्सर उठता है – क्या भारत के इतिहास में किसी आदिवासी नेता को अब तक भारत रत्न मिला है? नहीं, ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। यह आदिवासी समाज की मुख्यधारा में पूर्ण भागीदारी की कमी को दर्शाता है। पद्म भूषण एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन भारत रत्न जैसा सर्वोच्च सम्मान गुरुजी की विरासत के अनुरूप होगा।

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