जनजातीय महाकुंभ 2026: दिल्ली में गूंजी ‘डीलिस्टिंग’ की माँग, निशा उरांव ने कहा – ‘आदिवासी अस्मिता की रक्षा के लिए अनिवार्य’
दिल्ली के ‘जनजातीय सांस्कृतिक समागम 2026’ में गूंजी डीलिस्टिंग की मांग। अमित शाह ने UCC से आदिवासियों को बाहर रखने का दिया आश्वासन। जानें IRS निशा उरांव ने क्यों बताया डीलिस्टिंग को आदिवासी अस्मिता के लिए अनिवार्य।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!डेस्क : राजधानी दिल्ली में आज आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक समागम 2026′ ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इस विशाल समागम में देशभर के 500 से अधिक जनजातीय समूहों के ढाई लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दौरान जहाँ जनजातीय संस्कृति का भव्य प्रदर्शन हुआ, वहीं ‘डीलिस्टिंग’ (धर्मांतरित आदिवासियों को एसटी सूची से बाहर करने) की माँग मुख्य केंद्र बनी रही।
गृह मंत्री का बड़ा आश्वासन: “UCC से जनजातीय समाज को बाहर रखा जाएगा”
समागम को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जनजातीय समाज के लिए एक बड़ा आश्वासन दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि समान नागरिक संहिता (UCC) के दायरे से जनजातीय समाज को बाहर रखा जाएगा। इस घोषणा का उपस्थित जनसमूह ने जोरदार स्वागत किया। गृह मंत्री ने देशभर से आए जनजातीय समुदायों की इस विशाल भागीदारी को जनजातीय महाकुंभ” की संज्ञा दी।
केंद्र में रहा झारखंड का गौरव
इस ऐतिहासिक आयोजन में झारखंड आकर्षण का केंद्र रहा। मंच पर भारत माता की तस्वीर के साथ एक ओर भगवान बिरसा मुंडा और दूसरी ओर बाबा कार्तिक उरांव की तस्वीरें सुशोभित थीं, जिससे राष्ट्रीय पटल पर झारखंड के आदिवासी इतिहास, बलिदान और समृद्ध परंपराओं को विशेष सम्मान प्राप्त हुआ।
‘डीलिस्टिंग’ ही आदिवासी समाज के भविष्य का समाधान: निशा उरांव
इस समागम में शामिल रहीं चर्चित चेहरा और IRS अधिकारी निशा उरांव ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखते हुए डीलिस्टिंग के समर्थन में मुखर पक्ष रखा। उन्होंने कहा, *”जो सरना आदिवासी अपने समाज और आस्था से प्यार करता है, वह डीलिस्टिंग का समर्थन करे। आदिवासी अस्मिता, परंपरा और धर्म का संरक्षण तभी संभव है जब डीलिस्टिंग हो।”
निशा उरांव ने उन तत्वों को भी चेतावनी दी जो आदिवासी आस्था से समझौता करने की वकालत कर रहे हैं। उन्होंने कहा,
“ऐसे लोग भाईचारे की बात कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे आदिवासी हितों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इन्हें किसी रहस्यमय ‘रिमोट कंट्रोल’ से संचालित किया जा रहा है। ये बीजेपी और आरएसएस का नाम लेकर ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि डीलिस्टिंग का लाभ किसी पार्टी को नहीं, बल्कि सीधे आदिवासी समाज को मिलेगा।”
‘धर्मांतरण है बड़ी चुनौती’
निशा उरांव ने स्पष्ट किया कि धर्मांतरण का मुद्दा केवल धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पेसा कानून, जमीन के अधिकार, रोजगार और आदिवासी संस्कृति को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी प्रतिबद्धता धर्मांतरित आदिवासियों की ‘घर वापसी’ सुनिश्चित करने की है, ताकि आदिवासी समाज अपनी जड़ों से फिर से जुड़ सके।
दिल्ली में आयोजित इस महाकुंभ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में ‘डीलिस्टिंग’ का मुद्दा आदिवासी राजनीति और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सबसे बड़ा आधार बनने वाला है।
निशा उरांव के इस रुख के बाद, क्या आपको लगता है कि आने वाले समय में आदिवासी समुदायों के बीच ‘डीलिस्टिंग’ को लेकर आम सहमति और मजबूत होगी? कमेन्ट में जरूर बताएं।

















