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झारखंड का ‘बालू संकट’: कई बालू घाटो के फाइल पर DC का हस्ताक्षर लेकिन उठाव की खबर नही जानिए क्या है कारण

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रांची: झारखंड में बालू की कमी से निर्माण कार्य ठप हैं, आम जनता परेशान है और सरकार अपन ने 444 में से 290 घाटों की नीलामी कर चुकी है। लेकिन सवाल यह है कि अगर नीलामी हो गई, कई डीसी के हस्ताक्षर हो गए, तो फिर बालू घाटों से बालू का उठाव क्यों नहीं ?

1. “शॉर्टकट” का इंतज़ार या एनजीटी का डर?

जानकारों का मानना है कि कंपनियां फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में हैं। चूँकि एनजीटी (NGT) की रोक सिर पर है, कंपनियां जानती हैं कि अभी निवेश करने पर वे कुछ ही दिनों का खनन कर पाएंगी। ऐसे में मशीनें उतारने और कर्मचारियों का खर्च उठाने का जोखिम उठाना उन्हें घाटे का सौदा लग रहा है। यह एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है ताकि एनजीटी के बाद की स्थिति का फायदा उठाया जा सके।

2. सीटीओ (CTO): फाइलों में कैद विकास

खनन पट्टा मिलना सिर्फ आधा रास्ता तय करना है। असली अड़चन ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ (CTO) की फाइल में फंसी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के बिना पत्थर का एक टुकड़ा भी उठाना कानूनी अपराध है। प्रशासन ने पट्टे तो दे दिए, लेकिन सीटीओ की जटिल प्रक्रिया ने सारा काम अधर में लटका दिया है। क्या यह प्रशासनिक विफलता है या फाइलों को लटकाने का कोई पुराना ‘खेल’?

3. अवैध कारोबारियों की ‘ खेल’ और कंपनियों का दबाव

एक तरफ जहां वैध तरीके से बालू नहीं निकल रहा, वहीं दूसरी ओर अवैध बालू माफियाओं की चांदी कट रही है। कंपनियां अब मीडिया और अलग-अलग मंचों पर ‘दबाव’ बना रही हैं। जानकारों का कहना है कि यह दबाव सिर्फ प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाली देरी का दोष प्रशासन पर मढ़ने की एक तैयारी है।

4. कालाबाजारी का ‘सुपरमार्केट’

जब बाजार में वैध बालू नहीं होता, तो कालाबाजारी का ‘सुपरमार्केट’ खुल जाता है। दाम दोगुने हो जाते हैं और राजस्व का भारी नुकसान होता है। झारखंड में अभी यही हो रहा है। 290 घाटों के पट्टे होने के बावजूद जनता को बालू नहीं मिल रहा, जिससे निर्माण कार्य करने वाले लोग अब अवैध रास्तों को ही एकमात्र विकल्प मान बैठे हैं।

क्या यह सिर्फ प्रशासनिक देरी है?

कंपनियों की चुप्पी कई संदेह पैदा करती है। क्या कंपनियां सीटीओ न मिलने का बहाना बनाकर एनजीटी के प्रतिबंध का इंतज़ार कर रही हैं ताकि अभी महज कुछ दिनों ले लिए पूंजी ना लगानी पड़े। ऐसे में ‘अवैध’ बाजार और भी गर्म होगा इतना तो तय है

सवाल बड़ा है: क्या आम लोगो की चिंता सरकार को है लेकिन प्रशासन को नही, प्रदूषण नियंत्रण विभाग जिन्हें कंपनी को cto देना है वो इतना विलंब क्यों कर रही है।

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