10 साल पुराने विभागीय मामले में जूनियर इंजीनियर को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने सजा रद्द की, सरकार की अपील भी खारिज

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के जूनियर इंजीनियर रमेश्वर सिंह को बड़ी राहत देते हुए उन पर लगाई गई विभागीय सजा को रद्द कर दिया है। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने 197 दिन की देरी से लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट की खंडपीठ ने देरी माफ करने से इनकार करते हुए अपील भी खारिज कर दी। इससे सिंगल बेंच का फैसला बरकरार रहेगा।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!क्या था मामला?
मामला देवघर शहरी जलापूर्ति योजना (Deoghar Urban Water Supply Scheme) से जुड़ा है। वर्ष 2012 में नंदन झील से बोल्डर की खुदाई, लोडिंग-अनलोडिंग, स्टैकिंग और कीचड़ हटाने के कार्य में ठेकेदार को कथित रूप से अधिक भुगतान करने के आरोप में विभाग ने जूनियर इंजीनियर रमेश्वर सिंह के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की थी।
पहले वर्ष 2014 में विभाग ने उनकी वेतन वृद्धि घटाते हुए तीन वर्षों के लिए वेतनमान के न्यूनतम स्तर पर भेजने की सजा दी थी। इस आदेश को हाईकोर्ट ने 2015 में रद्द करते हुए विभाग को नए आरोप तय कर चार महीने के भीतर नई विभागीय जांच पूरी करने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की सजा?
सिंगल बेंच ने पाया कि विभाग ने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया।
नए आरोप तय करने के बजाय पुराना आरोपपत्र ही दोबारा दे दिया गया।
चार महीने में जांच पूरी नहीं की गई।
जांच के दौरान कर्मचारी को समुचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।
जरूरी दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए।
जांच रिपोर्ट केवल विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर तैयार कर दी गई।
अदालत ने माना कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
10 साल बाद दोबारा जांच से किया इनकार
न्यायमूर्ति राजेश शंकर ने कहा कि मूल आरोपपत्र जारी हुए 10 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। विभाग पहले ही अदालत के निर्देशों का पालन करने में विफल रहा है। ऐसे में मामले को दोबारा विभाग को भेजना केवल औपचारिकता होगी। इसलिए सजा और अपीलीय आदेश दोनों को रद्द कर दिया गया।
सरकार की अपील भी खारिज
सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने 197 दिन की देरी से LPA दायर की। सरकार ने लोकसभा चुनाव और फाइलों के विभिन्न अधिकारियों के बीच घूमने को देरी का कारण बताया।
हालांकि, न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि चुनावी व्यस्तता और फाइलों का टेबल-दर-टेबल घूमना पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने देरी माफ करने से इनकार करते हुए I.A. No. 7136 of 2025 तथा LPA No. 490 of 2025 दोनों को खारिज कर दिया।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि:
सरकारी विभाग भी समयसीमा (Limitation) का पालन करने के लिए बाध्य हैं।
विभागीय जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।
अदालत के आदेशों की अनदेखी कर वर्षों तक लंबित रखी गई विभागीय कार्रवाई को न्यायालय स्वीकार नहीं करेगा।


















