बरसात में बुलडोज़र: मोरहाबादी की कार्रवाई ने खड़े किए कई बड़े सवाल

नवीन कुमार
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!रांची के मोरहाबादी में बारिश के मौसम के बीच जिस तरह बुलडोज़र चले और कई परिवारों के आशियाने ध्वस्त हुए, उसने सिर्फ दीवारें नहीं गिराईं, बल्कि व्यवस्था के सामने कई असहज सवाल भी खड़े कर दिए। सवाल यह नहीं है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हटना चाहिए या नहीं। कानून स्पष्ट है—सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे को वैध नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अतिक्रमण हो रहा था, तब आखिर प्रशासन कहाँ था?
कोई मकान रातों-रात नहीं बन जाता। पहले जमीन पर कब्जा होता है, फिर नींव पड़ती है, दीवारें उठती हैं, छत बनती है, बिजली-पानी के कनेक्शन लगते हैं और वर्षों तक लोग वहां रहते भी हैं। यह सब प्रशासन की आंखों के सामने होता है। और इन सबके बीच प्रशाशन और नगर निगम के अधिकारी गहरी निद्रा में सोए रहते हैं।। वयदि शुरुआत में ही अवैध निर्माण रोक दिया जाए, तो न किसी का घर टूटे और न ही सरकार को बुलडोज़र लेकर पहुंचना पड़े।

मोरहाबादी की कार्रवाई ने एक और सवाल खड़ा किया है। क्या मानसून के बीच, जब लगातार बारिश हो रही हो, तब लोगों के घरों को तोड़ना मानवीय दृष्टि से उचित है? यदि कार्रवाई जरूरी भी थी, तो क्या विस्थापित परिवारों की सुरक्षा, बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था तथा पर्याप्त समय देने जैसे मानवीय पहलुओं पर पूरा ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए ?
अतिक्रमण किसी भी शहर के लिए गंभीर समस्या है। सड़कें सिकुड़ती हैं, नाले बंद हो जाते हैं, जलभराव बढ़ता है और सरकारी योजनाएं प्रभावित होती हैं। इसलिए अतिक्रमण हटाना प्रशासन का दायित्व है। लेकिन उतना ही बड़ा दायित्व यह भी है कि अतिक्रमण होने ही क्यों दिया गया?
हर बुलडोज़र कार्रवाई के बाद अतिक्रमणकारियों पर तो कार्रवाई दिखती है, लेकिन उन अधिकारियों की जिम्मेदारी शायद ही कभी तय होती है जिनकी निगरानी में वर्षों तक अवैध निर्माण होता रहा। यदि जवाबदेही केवल गरीब परिवारों तक सीमित रहे और प्रशासनिक लापरवाही पर पर्दा पड़ जाए, तो ऐसी कार्रवाई न्याय से अधिक व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन जाती है।
रांची जैसे तेजी से बढ़ते शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाना जरूरी है। लेकिन यह अभियान तभी सफल माना जाएगा जब इसकी शुरुआत बुलडोज़र से नहीं, बल्कि समय पर निगरानी, डिजिटल भूमि रिकॉर्ड, नियमित निरीक्षण, भ्रष्टाचार पर अंकुश और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही से होगी।
कानून का उद्देश्य केवल ढहाना नहीं, बल्कि व्यवस्था कायम करना है। यदि हर बार प्रशासन तब जागे जब मकान बनकर तैयार हो जाएं, तो बुलडोज़र कानून का नहीं, प्रशासनिक देरी का प्रतीक बन जाता है।
मोरहाबादी की घटना सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं है। यह प्रशासन के लिए भी एक आईना है। सवाल केवल यह नहीं कि किसने जमीन पर कब्जा किया, बल्कि यह भी कि उस कब्जे को वर्षों तक पनपने किसने दिया।
कानून का सम्मान जरूरी है, लेकिन कानून का मानवीय और समयबद्ध क्रियान्वयन उससे भी कहीं अधिक जरूरी है। क्योंकि सुशासन की पहचान केवल बुलडोज़र नहीं, बल्कि समय पर जागने वाला प्रशासन होता है।
















