10 साल नौकरी कराई, फिर फर्जी प्रमाणपत्र बताकर हटाया; हाई कोर्ट ने बहाल किया, सरकार की 559 दिन देरी वाली अपील भी खारिज

रांची झारखंड हाई कोर्ट ने आंगनबाड़ी सेविका सकीला बानो से जुड़े मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने पहले सेवा समाप्ति का आदेश रद्द करते हुए सकीला बानो की बहाली का निर्देश दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देने के लिए लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) दायर की, लेकिन 559 दिनों की देरी से अपील दाखिल करने पर हाई कोर्ट की खंडपीठ ने देरी माफ करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही सरकार की अपील भी खारिज हो गई और सिंगल बेंच का फैसला बरकरार रहा।
क्या है पूरा मामला?
देवघर जिले के चंदनपुरा आंगनबाड़ी केंद्र में वर्ष 2007 में आयोजित आमसभा के माध्यम से सकीला बानो का चयन आंगनबाड़ी सेविका के पद पर हुआ था। चयन समिति की अनुशंसा के बाद बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (CDPO) ने उन्हें नियुक्ति पत्र जारी किया और उन्होंने करीब दस वर्षों तक सेविका के रूप में कार्य किया।

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वर्ष 2016 में अचानक सीडीपीओ ने उन पर नियुक्ति के समय फर्जी एवं कूटरचित शैक्षणिक प्रमाणपत्र जमा करने का आरोप लगाया। उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। जवाब को असंतोषजनक बताते हुए 28 अक्टूबर 2016 को उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।
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याचिकाकर्ता ने कोर्ट में क्या कहा?
सकीला बानो ने हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा कि नियुक्ति से पहले उनके सभी प्रमाणपत्रों की जांच चयन समिति द्वारा की गई थी। यदि प्रमाणपत्र फर्जी होते तो नियुक्ति ही नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों में संबंधित विद्यालय ने स्पष्ट किया कि उनका प्रमाणपत्र वास्तविक है और स्कूल के नामांकन रजिस्टर में उनका नाम भी दर्ज है। इसके बावजूद बिना समुचित जांच के उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।
सरकार का क्या था पक्ष?
राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि सकीला बानो ने फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल की थी। सरकार ने यह भी कहा कि वह केवल आठवीं पास थीं, जबकि आंगनबाड़ी सेविका के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक थी। इसलिए उनकी नियुक्ति नियमों के अनुरूप नहीं थी।
हाई कोर्ट ने सरकार की कार्रवाई को बताया गलत
न्यायमूर्ति डॉ. एस.एन. पाठक की एकलपीठ ने कहा कि नियुक्ति के समय प्रमाणपत्रों की जांच करना प्रशासन की जिम्मेदारी थी। यदि अधिकारियों ने उस समय जांच नहीं की, तो दस वर्ष बाद उसी आधार पर कर्मचारी को हटाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि RTI के माध्यम से प्राप्त स्कूल के रिकॉर्ड से प्रमाणपत्र के वास्तविक होने की पुष्टि होती है, लेकिन अधिकारियों ने इस महत्वपूर्ण साक्ष्य पर विचार ही नहीं किया। अदालत ने यह भी माना कि नियुक्ति के समय संबंधित नियमों के तहत विशेष परिस्थितियों में शैक्षणिक योग्यता में छूट देने का प्रावधान था और चयन समिति ने संभवतः उसी आधार पर नियुक्ति की थी।
बहाली और बकाया मानदेय का आदेश
हाई कोर्ट ने 28 अक्टूबर 2016 का सेवा समाप्ति आदेश रद्द करते हुए राज्य सरकार को सकीला बानो को तत्काल आंगनबाड़ी सेविका के पद पर बहाल करने का निर्देश दिया। साथ ही सेवा समाप्ति की अवधि का पूरा मानदेय (Honorarium) तथा अन्य सभी परिणामी लाभ आठ सप्ताह के भीतर देने का आदेश भी दिया।
सरकार की अपील भी नहीं बची
सिंगल बेंच के इस फैसले के खिलाफ झारखंड सरकार ने LPA No. 266 of 2025 दायर की, लेकिन यह अपील 559 दिनों की देरी से दाखिल हुई। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि सरकार देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बता सकी। केवल फाइलों के इधर-उधर घूमने और प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सरकारी विभागों को भी लिमिटेशन कानून का पालन करना होगा और “प्रशासनिक सुस्ती” देरी माफ करने का आधार नहीं बन सकती। इसी आधार पर देरी माफी की याचिका और उससे जुड़ी LPA दोनों को खारिज कर दिया गया।
फैसले का महत्व
यह निर्णय सरकारी विभागों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वर्षों तक फाइलें लंबित रखने और बाद में प्रशासनिक प्रक्रिया का बहाना बनाकर अदालत से राहत नहीं मांगी जा सकती। साथ ही, यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति के समय दस्तावेजों की जांच प्रशासन ने स्वयं की है, तो लंबे समय बाद उसी आधार पर कार्रवाई करते समय निष्पक्ष जांच और ठोस साक्ष्य आवश्यक होंगे।














