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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 50-60 साल बाद नहीं मिलेगा वंशानुगत प्रधान बनने का अधिकार, LPA खारिज

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रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने संताल परगना क्षेत्र के देवघर जिले के तराजोरा गांव में प्रधान (हेडमैन) की नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने LPA No. 332 of २०२६ में पवन कुमार मंडल की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी गांव में लंबे समय तक वंशानुगत प्रधान नहीं रहा और गांव प्रशासनिक रिकॉर्ड में खास गांव’ के रूप में दर्ज है, तो दशकों बाद कोई व्यक्ति केवल वंशानुगत दावा करके उसे फिर से **’प्रधानी गांव’** घोषित नहीं करा सकता।

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क्या था मामला?

अपीलकर्ता पवन कुमार मंडल का दावा था कि उनके दादा लगभग 50-60 वर्ष पहले गांव के प्रधान थे। इसलिए उन्हें भी वंशानुगत अधिकार के आधार पर प्रधान नियुक्त किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि गांव मूल रूप से प्रधानी गांव था और उसका दर्जा समाप्त नहीं हो सकता।

वहीं, याचिकाकर्ता (उनके भाई) ने इस दावे को चुनौती देते हुए कहा कि दादा की मृत्यु के बाद न तो उनके पिता और न ही परिवार का कोई अन्य सदस्य प्रधान बना। इसके बाद गांव लगातार खास गांव के रूप में संचालित होता रहा, इसलिए अब प्रधान का चयन चुनाव के माध्यम से ही होगा।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

खंडपीठ ने कहा कि:

दादा की मृत्यु के बाद पिछले 50-60 वर्षों में परिवार का कोई सदस्य वंशानुगत प्रधान नहीं बना।
सरकारी रिकॉर्ड से भी स्पष्ट है कि गांव लंबे समय से  खास गांव n के रूप में दर्ज है।
सिर्फ इस आधार पर कि कभी अतीत में कोई व्यक्ति प्रधान था, गांव हमेशा के लिए ‘प्रधानी गांव’ नहीं बना रह सकता।
यदि उत्तराधिकारी उपलब्ध नहीं होता और लंबे समय तक वंशानुगत प्रधान की नियुक्ति नहीं होती, तो गांव खास गांव में परिवर्तित हो जाता है।

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सुप्रीम कोर्ट और फुल बेंच के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने Sheapujan Bhagat बनाम Thakur Hembrom (1997) तथा झारखंड हाईकोर्ट की फुल बेंच के फैसले Alamuni Hansda (2023) का हवाला देते हुए कहा कि:

उत्तराधिकारी उपलब्ध नहीं होने पर प्रधानी गांव खास गांव बन सकता है।
एक ही समय में कोई गांव प्रधानी और खासदोनों नहीं हो सकता।
कई दशक बाद सामने आए कथित उत्तराधिकारी के दावे से गांव का दर्जा स्वतः नहीं बदल जाता।

सिंगल बेंच के फैसले पर लगी मुहर

डिवीजन बेंच ने कहा कि सिंगल जज ने सही माना था कि तराजोरा गांव वर्तमान में  खास गांव  है। इसलिए यहां संताल परगना टेनेंसी (सप्लीमेंटरी प्रोविजंस) एक्ट, 1949 की धारा 5 के तहत चुनाव के माध्यम से प्रधान का चयन होगा , न कि वंशानुगत आधार पर।

कोर्ट का अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता अपने वंशानुगत दावे के समर्थन में कोई ठोस रिकॉर्ड या तिथि प्रस्तुत नहीं कर सके। ऐसे में सिंगल जज के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। परिणामस्वरूप LPA No. 332 of 2026 को खारिज कर दिया गया । साथ ही, लंबित सभी अंतरिम आवेदन भी निष्पादित कर दिए गए।

फैसले का महत्व

यह निर्णय संताल परगना क्षेत्र में प्रधान/हेडमैन की नियुक्ति से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि लंबे समय तक वंशानुगत प्रधान का अस्तित्व समाप्त रहने पर गांव का दर्जा ‘खास गांव’ हो जाता है और बाद में केवल पारिवारिक दावे के आधार पर वंशानुगत अधिकार पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

 

 

 

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