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झारखंड हाईकोर्ट  गैंगरेप के दोषी की समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज 

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रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने गैंगरेप के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे मोहम्मद यूनुस अंसारी की समयपूर्व (Premature) रिहाई की मांग खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही दोषी के मामले पर वर्ष 1984 की रिहाई नीति लागू होती है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार अपराध की गंभीरता और समाज पर उसके प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता मोहम्मद यूनुस अंसारी ने गृह विभाग की 20 अक्टूबर 2022 और 25 जनवरी 2024 की उन अधिसूचनाओं को चुनौती दी थी, जिनके जरिए राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (State Sentence Review Board) ने उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग अस्वीकार कर दी थी।

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अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता को वर्ष 2004 में सत्र वाद संख्या 84/2001 में गैंगरेप के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। वह बिना किसी रिमिशन (Remission) के 21 वर्ष 2 माह से अधिक समय जेल में बिता चुका है। इससे पहले भी वर्ष 2017 और 2020 में उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज हो चुकी थी। बाद में हाईकोर्ट ने एक पुराने आदेश में मामले को दोबारा विचार के लिए राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के पास भेजा था, लेकिन पुनर्विचार के बाद भी बोर्ड ने उसकी रिहाई से इनकार कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसकी सजा के समय झारखंड की अलग रिहाई नीति लागू नहीं थी, इसलिए बिहार सरकार की 24 फरवरी 1984 की नीति के अनुसार 14 वर्ष की वास्तविक सजा और 20 वर्ष की कुल अवधि पूरी होने पर उसे रिहा किया जाना चाहिए था। यह भी कहा गया कि बोर्ड ने हाईकोर्ट के पूर्व आदेश और 1984 की नीति का सही तरीके से पालन नहीं किया।

वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि दोषी सामूहिक दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध में सजा काट रहा है। ऐसे व्यक्ति की समयपूर्व रिहाई समाज के लिए खतरा बन सकती है और अपराध की पुनरावृत्ति की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए सजा समीक्षा बोर्ड का निर्णय उचित है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता का मामला वास्तव में वर्ष 1984 की नीति से संचालित होगा, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के State of Haryana vs Jagdish (2010) 4 SCC 216 फैसले के अनुसार केवल सजा की अवधि पूरी होना ही रिहाई का आधार नहीं हो सकता। अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता, समाज पर संभावित प्रभाव और दोषी के आचरण जैसे पहलुओं पर भी विचार करना आवश्यक है।

अदालत ने पाया कि राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने अपने निर्णय में अपराध की गंभीरता, समाज पर संभावित असर और भविष्य में ऐसे अपराध की पुनरावृत्ति की आशंका जैसे सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार किया था। रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि याचिकाकर्ता 21 अन्य आरोपियों के साथ एक युवती के सामूहिक दुष्कर्म का दोषी है।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के निर्णय में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है और समयपूर्व रिहाई से इनकार करने का फैसला उचित है। इसी आधार पर अदालत ने 20 अक्टूबर 2022 और 25 जनवरी 2024 की अधिसूचनाओं को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी। साथ ही लंबित सभी अंतरिम आवेदन भी निष्पादित कर दिए।

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