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मधुकम जमीन विवाद : 30 साल पुराने जमीन विवाद में आखिर कोर्ट में ऐसा क्या हुआ कि जितने के बाद याचिकाकर्ता हार गया ? कैसे पूरी बाजी पलट गई, आइए समझते हैं पूरा मामला

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मधुकम जमीन विवाद :रांची:कभी-कभी अदालत में  मामले का  निर्णय   सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता  कि कानून किसके पक्ष में है, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि अदालत के सामने पूरी सच्चाई रखी गई या नहीं। झारखंड हाईकोर्ट के हालिया फैसले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। करीब तीन दशक पुराने जमीन विवाद में, जहां याचिकाकर्ता पहले कई स्तरों पर कानूनी लड़ाई जीत चुका था, वहीं एक तथ्य छिपाने के आरोप ने पूरी बाजी पलट दी। नतीजा यह हुआ कि जिस आदेश के पालन के लिए अवमानना याचिका दायर की गई थी, उसी आदेश को हाईकोर्ट ने  विलोपित  कर दिया और याचिकाकर्ता पर 12 लाख रुपये का जुर्माना भी लगा दिया।

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1993 से शुरू हुई कानूनी लड़ाई

कहानी की शुरुआत वर्ष 1993 से होती है। रांची के मधुकम निवासी महादेव उरांव ने अपनी 45 डिसमिल जमीन वापस पाने के लिए छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम की धारा 71-ए के तहत एसएआर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वर्ष 1996 में एसएआर कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और जमीन बहाल करने का आदेश दिया। इसके बाद अपील, पुनरीक्षण और हाईकोर्ट तक लंबी कानूनी लड़ाई चली, लेकिन हर स्तर पर अंततः महादेव उरांव के पक्ष में फैसला कायम रहा।

फिर हाईकोर्ट क्यों जाना पड़ा?

इतनी लंबी कानूनी लड़ाई जीतने के बावजूद जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं मिला। इस पर महादेव उरांव ने वर्ष 2024 में हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। अदालत ने 22 अक्टूबर 2024 को हेहल के अंचल अधिकारी (Circle Officer) को निर्देश दिया कि संबंधित पक्षों को नोटिस देकर यह सुनिश्चित करें कि पुराने आदेश अब भी प्रभावी हैं और उसके बाद नियमानुसार जमीन का कब्जा याचिकाकर्ता को सौंपा जाए।

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आदेश का पालन नहीं हुआ तो दाखिल हुई अवमानना याचिका

जब तय समय में आदेश का पालन नहीं हुआ तो महादेव उरांव ने अवमानना याचिका दायर कर कहा कि सरकारी अधिकारी जानबूझकर हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। शुरुआत में मामला सिर्फ आदेश के अनुपालन तक सीमित दिखाई दे रहा था।

यहीं से पलट गई पूरी बाजी

सुनवाई के दौरान 12 लोगों ने अदालत में हस्तक्षेप आवेदन दाखिल किया। उन्होंने कहा कि वे जिस जमीन पर रह रहे हैं, उसके संबंध में वर्ष 2019 और 2020 के बीच महादेव उरांव के साथ 11 समझौते हुए थे। इन समझौतों के तहत उन्हें जमीन पर रहने दिया गया और बदले में करीब 1.08 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। उनका आरोप था कि इन समझौतों की जानकारी जानबूझकर अदालत से छिपाई गई।

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कोर्ट ने पूछा- इतने बड़े समझौते का जिक्र क्यों नहीं किया?

जब यह तथ्य सामने आया तो हाईकोर्ट ने इसे गंभीर माना। अदालत ने कहा कि यदि जमीन को लेकर निजी समझौते हुए थे और बड़ी रकम का लेन-देन हुआ था, तो यह जानकारी अदालत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता का यह दायित्व था कि वह रिट याचिका दायर करते समय इन सभी तथ्यों का उल्लेख करता।

याचिकाकर्ता ने क्या कहा?

महादेव उरांव ने अदालत को बताया कि ये केवल एग्रीमेंट टू सेल थे, जिनसे स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि कई चेक बाउंस हो गए थे, इसलिए समझौते प्रभावी नहीं रहे। साथ ही उनका तर्क था कि अनुसूचित जनजाति की जमीन होने के कारण ऐसे समझौते सीएनटी एक्ट के तहत वैध नहीं थे और उन पर दबाव बनाकर हस्ताक्षर कराए गए थे।

लेकिन अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई

हाईकोर्ट ने कहा कि समझौते वैध थे या अवैध, यह अलग विवाद हो सकता है। लेकिन उनका अस्तित्व और उनसे जुड़ी परिस्थितियां छिपाई नहीं जा सकती थीं। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता ने न केवल समझौतों की जानकारी छिपाई, बल्कि जिन लोगों के साथ समझौते किए थे, उन्हें रिट याचिका में पक्षकार भी नहीं बनाया।

फिर कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालय के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना अदालत के साथ धोखाधड़ी है। यदि कोई आदेश अधूरी या भ्रामक जानकारी के आधार पर प्राप्त किया गया हो तो वह कानून की नजर में शून्य माना जाएगा।

एक आदेश ने पूरी तस्वीर बदल दी

अदालत ने साफ कहा कि 22 अक्टूबर 2024 का आदेश महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर हासिल किया गया था। इसलिए वही आदेश अब प्रभावहीन हो गया। जब मूल आदेश ही समाप्त हो गया तो उसकी अवमानना का मामला भी स्वतः समाप्त हो गया। इसी आधार पर अवमानना याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

सर्किल ऑफिसर को भी नहीं मिली राहत

फैसले में हाईकोर्ट ने हेहल के तत्कालीन अंचल अधिकारी की भी आलोचना की। अदालत ने कहा कि न्यायालय ने केवल कानूनी प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया था, लेकिन अधिकारी ने जमीन पर बने ढांचों को गिरा दिया, जबकि ऐसा कोई आदेश नहीं था। कोर्ट ने उनके इस कदम को अनुचित बताते हुए भविष्य में सतर्क रहने की चेतावनी दी।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 12 लाख रुपये  विपक्षी  जिनकी संख्या 12 है प्रत्येक को एक-एक लाख रुपये चार सप्ताह के भीतर अदा करने का निर्देश दिया । साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि जमीन के स्वामित्व और अधिकार से जुड़े विवाद पर सभी पक्ष कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

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