भारी हंगामे के बीच लोकसभा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, मानसून सत्र में 19 फीसदी हुआ काम

नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र गुरुवार, 13 अगस्त 2026 को लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ समाप्त हो गया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन को साइन डाई (अनिश्चितकाल) के लिए स्थगित करने की घोषणा की। अंतिम बैठक कुछ ही मिनट चली। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत कई सांसद सदन में मौजूद रहे।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र 13 अगस्त तक चला। इस दौरान लोकसभा की कुल 19 बैठकें हुईं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार, लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा की उत्पादकता लगभग 39 प्रतिशत दर्ज की गई। पूरे सत्र में प्रश्नकाल एक भी दिन निर्धारित अवधि के अनुसार नहीं चल सका।

हंगामे और टकराव के बीच चला सत्र
मानसून सत्र की शुरुआत से ही सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों को लेकर तीखा टकराव देखने को मिला। विपक्ष ने विभिन्न मुद्दों पर सरकार से जवाब और चर्चा की मांग की, जबकि सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाया।
हंगामे, नारेबाजी और विपक्ष के वॉकआउट के कारण सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित होती रही। इसके चलते विधायी कामकाज के लिए उपलब्ध समय प्रभावित हुआ। विपक्ष का आरोप रहा कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा से बच रही है। वहीं सरकार ने विपक्ष पर चर्चा के बजाय सदन बाधित करने का आरोप लगाया।
12 विधेयक पारित
कम उत्पादकता के बावजूद सरकार ने विधायी कामकाज के लिहाज से सत्र को उपलब्धियों वाला बताया। सत्र के दौरान लोकसभा में कुल 12 विधेयक पारित किए गए। इनमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े संशोधन और विधायी प्रस्ताव शामिल रहे।
सत्र के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने, एमएसएमई से जुड़े प्रावधानों में बदलाव, कराधान संबंधी संशोधन तथा खनन और खनिज क्षेत्र से जुड़े संशोधन जैसे विधायी प्रस्ताव चर्चा में रहे। केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने से संबंधित विधेयक भी प्रमुख विधायी प्रस्तावों में शामिल रहा।
एफसीआरए संशोधन विधेयक को आगे की जांच और विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया।

चर्चा और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल
सत्र की कम उत्पादकता ने संसदीय कार्यवाही की गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े किए। विपक्ष ने आरोप लगाया कि कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त बहस नहीं हुई। दूसरी ओर, सरकार ने जोर दिया कि व्यवधान के बावजूद विधायी कामकाज को आगे बढ़ाया गया।
संसदीय प्रक्रिया में विधेयकों पर विस्तृत चर्चा, विपक्ष की भागीदारी और सरकार की जवाबदेही को लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। ऐसे में कम समय में विधेयकों के पारित होने और सदन के लगातार बाधित रहने को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज रही।
गढ़वा : शिक्षक के तबादले के खिलाफ सड़क पर उतरे छात्र, छात्रों के चहेते मलय सर वापस होंगे
वंदे मातरम् की पूर्ण प्रस्तुति भी चर्चा में
सत्र के अंतिम दिन वंदे मातरम् की पूर्ण प्रस्तुति भी चर्चा का विषय रही। इसे संसद की कार्यवाही के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना गया। वंदे मातरम् को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद भी सामने आए।
सत्ता पक्ष ने बताया सफल, विपक्ष ने उठाए सवाल
मानसून सत्र के समापन के बाद इसकी तस्वीर दो अलग-अलग नजरिए से सामने आई। सरकार ने विधायी कामकाज और पारित विधेयकों को अपनी उपलब्धि बताया, जबकि विपक्ष ने कम उत्पादकता, व्यवधान और सीमित चर्चा को लेकर सरकार पर निशाना साधा।
कुल मिलाकर 25 दिनों तक चला मानसून सत्र राजनीतिक टकराव, हंगामे और सीमित संसदीय कामकाज के बीच समाप्त हुआ। 19 बैठकों और करीब 19 प्रतिशत उत्पादकता के आंकड़े ने एक ओर विधायी कामकाज की मात्रा को रेखांकित किया, वहीं दूसरी ओर सदन में सार्थक बहस और जवाबदेही को लेकर सवाल भी खड़े किए।

















