मेहनत को बनाया हथियार, स्वयं सहायता समूह ने बदली दयामनी की जिंदगी

शंभू कुमार सिंह
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सिमडेगा: केरसई प्रखंड के पथरीटोली गांव की दयामनी किंडो आज ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल बन गई हैं। कभी धान की खेती और मजदूरी पर निर्भर रहने वाली दयामनी ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपनी मेहनत और मिले सहयोग के दम पर आजीविका का नया रास्ता तैयार किया। दयामनी वर्ष 2020 में जेएसएलपीएस के कमल स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। इसके बाद उन्होंने बागवानी सखी के रूप में जिम्मेदारी संभाली और आजीविका बढ़ाने के लिए पशुपालन की दिशा में कदम बढ़ाया।

सितंबर 2025 में हार्डनिंग सेंटर से उन्हें 40 बतख के चूजे मिले। इसके साथ ही स्वयं सहायता समूह से ₹32 हजार का ऋण लेकर उन्होंने बतख और बकरी पालन का विस्तार किया। मेहनत का परिणाम यह रहा कि उन्होंने बतख और अंडों की बिक्री से ₹20 हजार, बकरी-खस्सी की बिक्री से ₹52 हजार और कैडर व कृषि गतिविधियों से ₹22,600 की आय अर्जित की। इस तरह उनकी कुल आय ₹94,600 तक पहुंच गई।
उपयुक्त कंचन सिंह ने कहा कि जेएसएलपीएस के महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जिले की महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होकर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं की यह सफलता योजनाओं की सार्थकता को भी साबित करती है। दयामनी की बढ़ी हुई आमदनी से अब परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। वह अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई के साथ घरेलू जरूरतों को भी आसानी से पूरा कर पा रही हैं। उनकी सफलता से प्रेरित होकर गांव के अन्य परिवार भी पशुपालन को आजीविका के साधन के रूप में अपनाने लगे हैं।

दयामनी की कहानी इस बात का उदाहरण है कि मेहनत, स्वयं सहायता समूह और सही अवसर मिल जाए तो ग्रामीण महिलाएं भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार की तस्वीर बदल सकती हैं।
















