Hemant Soren broke down during the final journey.

सोनू भैया नहीं रहे… अंतिम यात्रा में फफक पड़े हेमंत सोरेन, आंसुओं ने बयां किया गहरा रिश्ता

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गिरिडीह में सुदिव्य कुमार सोनू की अंतिम यात्रा का दृश्य बेहद भावुक कर देने वाला था। जिस नेता ने मुश्किल वक्त में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ मजबूती से खड़े रहकर राजनीतिक मोर्चे पर अपनी भूमिका निभाई, आज उसी साथी की अंतिम यात्रा में हेमंत सोरेन खुद अपने आंसुओं को रोक नहीं सके।

सुदिव्य सोनू के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे हेमंत सोरेन को देखते ही उनकी पत्नी भावुक होकर बिलख पड़ीं। पत्नी को इस हालत में देखकर मुख्यमंत्री भी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए। कुछ पल के लिए राजनीतिक संघर्ष, सत्ता और संगठन की तमाम बातें पीछे छूट गईं और सामने सिर्फ एक बेहद करीबी साथी को खोने का दर्द था।

सुदिव्य सोनू और हेमंत सोरेन के रिश्ते को समझने के लिए अंतिम यात्रा की ये तस्वीरें ही काफी थीं। शोक में डूबे मुख्यमंत्री कभी परिवार के सदस्यों को संभालते दिखे तो कभी सुदिव्य सोनू के बेटे के सिर पर हाथ रखकर उसे ढांढस बंधाते नजर आए।

शिबू सोरेन के बाद एक और बड़ा झटका

हेमंत सोरेन के लिए सुदिव्य सोनू का निधन महज एक पार्टी नेता का चले जाना नहीं है। यह ऐसे समय में हुआ है जब पिछले करीब एक साल में झामुमो के कई प्रमुख चेहरों का निधन पार्टी और परिवार के लिए गहरा आघात रहा है।

दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन के बाद मंत्री रामदास सोरेन और अब सुदिव्य कुमार सोनू का जाना हेमंत सोरेन के लिए लगातार लग रहे बड़े व्यक्तिगत और राजनीतिक झटकों में शामिल है।

सुदिव्य सोनू उन नेताओं में थे जो संगठन के भीतर बेहद सक्रिय रहे और विधानसभा से लेकर राजनीतिक मंच तक पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते थे। खासकर हेमंत सोरेन के राजनीतिक संकट के दौर में उनकी भूमिका को झामुमो के भीतर महत्वपूर्ण माना जाता रहा।

जब अर्थी उठी तो थम गया माहौल

गिरिडीह में सुदिव्य सोनू के आवास से जैसे ही उनकी अर्थी निकली, माहौल और भी गमगीन हो गया। परिवार के सदस्यों के साथ बड़ी संख्या में समर्थक और पार्टी कार्यकर्ता अंतिम यात्रा में शामिल हुए।

गांडेय विधायक कल्पना सोरेन भी इस भावुक क्षण में खुद को संभालती नजर आईं। सुदिव्य सोनू के साथ उनके राजनीतिक और पारिवारिक संबंधों की निकटता को देखते हुए उनके लिए भी यह बेहद कठिन क्षण था।

जिस साथी ने हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद झामुमो की राजनीतिक लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई, आज उसी साथी की अंतिम यात्रा में कल्पना सोरेन और हेमंत सोरेन दोनों मौजूद थे।

बेटे को संभालते रहे हेमंत सोरेन

अंतिम यात्रा के दौरान सबसे मार्मिक दृश्य तब दिखाई दिया, जब हेमंत सोरेन ने सुदिव्य सोनू के बेटे को संभाला। मासूम बेटे की आंखों में पिता को खोने का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

मुख्यमंत्री ने उसके सिर पर हाथ रखा और उसे अपने साथ रखा। कुछ ही देर पहले जो हेमंत सोरेन खुद भावुक होकर रो रहे थे, वही अपने साथी के बेटे को संभालने की कोशिश कर रहे थे।

सुदिव्य सोनू की अर्थी को कंधा देते हुए हेमंत सोरेन भी अंतिम यात्रा में साथ चले। यह सिर्फ एक राजनीतिक साथी की विदाई नहीं थी, बल्कि झामुमो के एक ऐसे कार्यकर्ता और नेता की विदाई थी, जिसने लंबे समय तक संगठन के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाया।

अब सबसे बड़ा सवाल—संगठन में खाली हुई जगह कौन भरेगा?

सुदिव्य सोनू के जाने से झामुमो को सिर्फ एक विधायक या मंत्री का नुकसान नहीं हुआ है। पार्टी ने एक ऐसा नेता खोया है जो राजनीतिक संघर्ष के दौरान संगठन की आवाज को मजबूती से सामने रखने वाले चेहरों में शामिल था।

विधानसभा के भीतर विपक्ष के हमलों का जवाब देने से लेकर संगठन के राजनीतिक बचाव तक, सुदिव्य सोनू लगातार सक्रिय दिखाई देते थे।

उनके निधन के बाद उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी की चर्चा भले आगे हो, लेकिन जिस व्यक्तिगत और राजनीतिक खालीपन को वह छोड़ गए हैं, उसे भरना आसान नहीं होगा।

एक तरफ परिवार ने अपना बेटा, पति और पिता खोया है, तो दूसरी तरफ झामुमो ने अपना एक सक्रिय सिपाही।

मृत्यु अंतिम सत्य है। सुदिव्य सोनू भी अपनी अंतिम यात्रा पर निकल गए—उस सफर पर, जहां से कोई लौटकर नहीं आता। पीछे रह गईं उनकी यादें, उनका परिवार, उनके समर्थक और वह राजनीतिक विरासत, जिसे अब आगे ले जाने की जिम्मेदारी उनके साथियों के कंधों पर होगी।

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