इसे संयोग कहे या नियति अजित दादा की पहचान घड़ी बनी ! जिस घड़ी के कारण वो इतना लड़े वो आज बंद हो गयी ।

इसे संयोग कहे या नियति अजित दादा की पहचान घड़ी बनी ! जिस घड़ी के कारण वो इतना लड़े वो आज बंद हो गयी ।

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इसे संयोग कहे या नियति अजित दादा की पहचान घड़ी बनी ! जिस घड़ी के कारण वो इतना लड़े वो आज बंद हो गयी ।

इसे संयोग कहे या नियति अजित दादा की पहचान घड़ी बनी ! जिस घड़ी के कारण वो इतना लड़े वो आज बंद हो गयी ।

इसे संयोग कहे या नियति अजित दादा पवार की पहचान अंत मे घड़ी ही बनी । दरअसल प्लेन हादसे में हुई हादसा इतना भीषण था कि शव पूरी तरह जल चुके थे, और पहचान करना बहुत मुश्किल हो गया था। अजित पवार की शिनाख्त उनकी कलाई पर बंधी घड़ी से हुई।
लोगो का कहना है की शव इस तरह जल गए थे की पहचान करना मुश्किल हो गया था । तब उनकी पहचान घड़ी ही बनी ।

यह बात और भी विडंबनापूर्ण इसलिए लग रही है क्योंकि अजित पवार की पार्टी (एनसीपी – अजित गुट) का चुनाव चिह्न भी घड़ी है। उन्होंने इस चिह्न के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी, और अब मृत्यु के बाद भी यही घड़ी उनकी पहचान बनी।

इसे नियति का खेल ही कह सकते है की अजित दादा की घड़ी ही उनकी पहचान बनी । हालांकि आज यह घड़ी हमेशा के लिए बंद हो गई”

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drishtinow

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