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बोकारो-तेतुलिया-103-एकड़-जमीन-अतिक्रमण-डीसी-वन-विभाग-विवाद।

बोकारो से सीनियर रिपोर्टर भूषण की रिपोर्ट

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बोकारो के तेतुलिया में 103 एकड़ सरकारी भूमि से जुड़े अतिक्रमण और अवैध खरीद-बिक्री के मामले ने डीसी (उपायुक्त) और वन विभाग के बीच तीखी तनातनी को जन्म दिया है। मीडिया रिपोर्ट की माने तो यह मामला न केवल प्रशासनिक विवाद का विषय है, बल्कि इसमें कई स्तरों पर लापरवाही, कथित भ्रष्टाचार और कानूनी उलझनों की परतें भी उजागर हो रही हैं। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
1. मामले की पृष्ठभूमि
स्थान और भूमि का स्वरूप:  मीडिया रिपोर्ट की माने तो यह विवाद बोकारो जिले के तेतुलिया में 103 एकड़ सरकारी भूमि को लेकर है। इसमें वन विभाग की संरक्षित वन भूमि और राजस्व विभाग की गैर-मजरूआ (उपयोग में न लाई जाने वाली) भूमि शामिल है।
अवैध गतिविधियां:  रिपोर्ट्स की माने तो इस जमीन पर अवैध खरीद-बिक्री और अतिक्रमण की शिकायतें सामने आईं। अतिक्रमणकारियों ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया, जिसमें वन विभाग की फर्जी एनओसी (No Objection Certificate) भी शामिल है।
सीआईडी जांच:  रिपोट्स की  माने तो मामले की गंभीरता को देखते हुए सीआईडी ने जांच शुरू की। इस जांच में कुछ अधिकारियों की संलिप्तता पर सवाल उठे, जिसके बाद डीसी और वन विभाग के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हुआ।
2. डीसी का पक्ष
रिपोर्ट्स के अनुसार बोकारो की डीसी विजया जाधव ने सीआईडी के जांच प्रतिवेदन के आधार पर वन विभाग पर निशाना साधा। उनका कहना है:
वन विभाग की भूमिका पर सवाल: डीसी ने पत्र लिखकर कहा कि वन विभाग के कुछ पदाधिकारी और कर्मचारी अतिक्रमणकारियों के साथ मिले हुए प्रतीत होते हैं। उनके अनुसार, वन विभाग ने अतिक्रमण रोकने में अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई।
जमीन पर निर्माण कार्य: डीसी ने यह भी उल्लेख किया कि जिस जमीन पर वर्तमान में निर्माण कार्य चल रहा है, उस पर वन विभाग ने ध्यान नहीं दिया। यह निर्माण अतिक्रमण का हिस्सा हो सकता है।
निर्देश की मांग: डीसी ने सुझाव दिया कि अगर टाइटल सूट (जमीन के स्वामित्व से जुड़ा मुकदमा) के लंबित रहने तक अतिक्रमण रोकने के लिए ट्रेंच कटाई (खाई खोदना) या पौधरोपण जैसे कदम उठाए जा सकते हैं, तो वन विभाग को स्पष्ट निर्देश देना चाहिए।
3. वन विभाग का जवाब
वन विभाग ने डीसी के पत्र और आरोपों का जवाब देते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की। वन प्रमंडल पदाधिकारी ने डीसी को पत्र लिखकर निम्नलिखित बिंदु उठाए:
आरोपों को बेबुनियाद बताया: वन विभाग ने कहा कि उसके पदाधिकारियों या कर्मचारियों की अतिक्रमणकारियों के साथ संलिप्तता का आरोप निराधार है। विभाग ने इसे दोनों विभागों (वन और राजस्व) की साझा जिम्मेदारी बताया।
जमीन का स्वरूप: मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो  यह भूमि आंशिक रूप से वन भूमि और आंशिक रूप से राजस्व विभाग की गैर-मजरूआ भूमि है। दोनों विभागों की जमीन पर अतिक्रमण हो रहा है,

सूचनाओं का आदान-प्रदान: वन विभाग ने सुझाव दिया कि अतिक्रमण रोकने के लिए दोनों विभागों को सूचनाएं, प्रतिवेदन और कार्रवाई की रणनीति साझा करनी चाहिए।
प्रतिबंधित सूची से हटाने पर आपत्ति: वन विभाग ने बताया कि 2015 में इस जमीन को प्रतिबंधित सूची में डाला गया था, लेकिन 11 सितंबर 2024 को डीसी द्वारा इसे सूची से हटा दिया गया। इस प्रक्रिया में वन विभाग से कोई मंतव्य (राय) नहीं मांगा गया, जो नियमों का उल्लंघन है।
फर्जी दस्तावेजों का खुलासा:  मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वन विभाग ने दावा किया कि जमीन के निबंधन से जुड़े 24 सेल डीड में से 13 में फर्जी एनओसी का उपयोग हुआ। विभाग ने इस आधार पर पहले ही मामला दर्ज कराया था, जिसे बाद में सीआईडी ने अपने हाथ में लिया।
4. जमीन का इतिहास और कानूनी उलझनें
इस मामले को समझने के लिए जमीन के ऐतिहासिक और कानूनी पहलुओं को देखना जरूरी है:
1962 में अधिग्रहण: यह जमीन 1962 में बोकारो स्टील लिमिटेड (बीएसएल) द्वारा अधिग्रहित की गई थी।
2012 में गलत जमाबंदी: चास सर्कल ऑफिसर (सीओ) ने इजहार और अख्तर हुसैन के नाम पर जमाबंदी कर दी, जो गलत थी।
2016 में सुधार: तत्कालीन डीसी ने इस जमाबंदी को रद्द कर दिया, और जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराकर वन विभाग के हवाले किया गया। उस समय अतिक्रमण हटाया गया।
2018 में फिर गड़बड़ी: 2018 में जमाबंदी को फिर से बहाल कर दिया गया, जिससे अतिक्रमण की समस्या दोबारा शुरू हो गई।
1933 का सेल डीड विवाद: जमाबंदी के लिए 1933 के एक सेल डीड का हवाला दिया गया, लेकिन पुरुलिया रजिस्ट्रार और जिला कलेक्टर की रिपोर्ट में इसे फर्जी करार दिया गया। इसके आधार पर वन विभाग ने मामला दर्ज किया था।
वर्तमान स्थिति: अब इस जमीन पर टाइटल सूट चल रहा है, यानी स्वामित्व को लेकर कानूनी विवाद लंबित है। बीएसएल को यह जमीन स्थानांतरित मानी जाती है, लेकिन अतिक्रमण और अवैध निर्माण जारी हैं।
5. प्रमुख विवाद के बिंदु
डीसी बनाम वन विभाग: डीसी का मानना है कि वन विभाग ने अतिक्रमण रोकने में लापरवाही बरती, जबकि वन विभाग का कहना है कि डीसी ने प्रतिबंधित सूची से जमीन हटाने जैसे फैसले बिना सहमति के लिए और निर्माण कार्यों पर ध्यान नहीं दिया।
फर्जी दस्तावेज: 13 फर्जी एनओसी और 1933 का फर्जी सेल डीड इस मामले की जटिलता को बढ़ाते हैं। यह सवाल उठता है कि इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा कैसे हो सका।
प्रशासनिक समन्वय की कमी: दोनों विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं, लेकिन अतिक्रमण रोकने के लिए कोई ठोस साझा रणनीति नहीं बन पाई है।
सीआईडी जांच: जांच में कुछ अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट कार्रवाई नहीं हुई। यह मामला भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है।
6. वर्तमान स्थिति और भविष्य
टाइटल सूट: जमीन का स्वामित्व तय करने के लिए मुकदमा चल रहा है। जब तक यह लंबित है, अतिक्रमण रोकना चुनौती बना हुआ है।
निर्माण कार्य: वन विभाग का कहना है कि अवैध निर्माण पर रोक लगाने के लिए डीसी को स्पष्ट निर्देश देना चाहिए। डीसी का कहना है कि वन विभाग को पहले कदम उठाना चाहिए।
सीआईडी जांच का इंतजार: जांच पूरी होने पर और साफ हो सकता है कि इस मामले में कौन-कौन जिम्मेदार है।
प्रतिबंधित सूची का मुद्दा: वन विभाग का दावा है कि जमीन को प्रतिबंधित सूची से हटाना गलत था, और इसे फिर से संरक्षित करने की जरूरत है।

जाहिर है यह मामला न केवल सरकारी जमीन के दुरुपयोग का उदाहरण है, बल्कि प्रशासनिक विभागों के बीच समन्वय की कमी को भी उजागर करता है। डीसी और वन विभाग के बीच पत्राचार और आरोप-प्रत्यारोप से स्पष्ट है कि दोनों अपनी जिम्मेदारियों को लेकर एक-दूसरे पर उंगली उठा रहे हैं। फर्जी दस्तावेजों, गलत जमाबंदी और अतिक्रमण की वजह से यह मामला जटिल हो गया है।

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