Champai Soren has sparked a new debate on social media regarding religious conversions

झारखंड में धर्मांतरण और ST आरक्षण पर पूर्व cm चम्पई सोरेन ने सोशल मीडिया में नई बहस छिड़ी छेड़ दी ।

Champai Soren has sparked a new debate on social media regarding religious conversions

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रांची: झारखंड की राजनीति में एक बार फिर धर्मांतरण, आदिवासी पहचान और आरक्षण का मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और सरायकेला विधायक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लंबा पोस्ट लिखकर धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण का लाभ दिए जाने पर सवाल उठाया है। उनके बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है।

हाई कोर्ट में दायर याचिका का किया जिक्र

चंपाई सोरेन ने अपने पोस्ट में कहा कि झारखंड हाई कोर्ट में एक समाजसेवी द्वारा जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें एक मंत्री के जाति प्रमाण पत्र पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। उन्होंने लिखा कि संबंधित एफिडेविट में धर्म के स्थान पर “ईसाई” दर्ज होने के बावजूद अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र जारी किया गया। हालांकि अपने पोस्ट में उन्होंने किसी मंत्री का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती, तो फिर अनुसूचित जनजाति का लाभ किस आधार पर दिया जा रहा है। चंपाई सोरेन ने इस मुद्दे को संविधान और आदिवासी अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बताया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का दिया हवाला

पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने पोस्ट में सुप्रीम कोर्ट की कुछ हालिया टिप्पणियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती और यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाता है तथा सक्रिय रूप से उसका पालन करता है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता।
इसके साथ ही उन्होंने 27 नवंबर 2024 की एक टिप्पणी का जिक्र करते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण समेत अन्य अधिकार लेने की कोशिश “संविधान के साथ धोखाधड़ी” मानी गई थी। चंपाई सोरेन ने कहा कि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

“आदिवासी अधिकारों पर हो रहा अतिक्रमण”

चंपाई सोरेन ने आरोप लगाया कि धर्मांतरण करने वाले लोग न सिर्फ आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों पर चुने जा रहे हैं, बल्कि सरकारी नौकरियों में ST कोटे का लाभ भी ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसका असर मूल आदिवासी समाज के अधिकारों और अवसरों पर पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी लिखा कि कई निजी और मिशनरी स्कूलों में धर्मांतरित समुदायों को बेहतर शिक्षा सुविधाएं मिलती हैं, जबकि गांवों और दूरदराज क्षेत्रों के आदिवासी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़कर पीछे रह जाते हैं।

आदिवासी संस्कृति और सरना परंपरा का किया जिक्र

अपने पोस्ट में चंपाई सोरेन ने आदिवासी समाज की परंपराओं, पूजा पद्धति और सांस्कृतिक पहचान का भी विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि आदिवासी समाज की अपनी अलग जीवनशैली है, जहां पेड़ों के नीचे पूजा होती है और जन्म से लेकर विवाह तथा मृत्यु तक हर संस्कार की अपनी परंपरा है।
उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति अपनी पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाज और पहचान छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाता है, तो उसे आदिवासी समाज के अधिकारों पर दावा नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार धर्मांतरण के बाद कई समुदाय अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान से दूर हो जाते हैं।

विदेशी जनजातियों का भी दिया उदाहरण

चंपाई सोरेन ने अपने पोस्ट में लैटिन अमेरिका, केन्या, ब्राजील और पैसिफिक द्वीपों की कुछ जनजातियों का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मांतरण के बाद वहां की कई मूल जनजातियां अपनी पारंपरिक संस्कृति और सामाजिक पहचान लगभग खो चुकी हैं। उन्होंने दावा किया कि मिशनरियों के प्रभाव और सामाजिक दबाव के कारण यह बदलाव देखने को मिला।

केंद्र सरकार से की डीलिस्टिंग की मांग

पूर्व मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से “डीलिस्टिंग” की प्रक्रिया लागू करने की मांग की। डीलिस्टिंग का मतलब धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर करना है। उन्होंने कहा कि आदिवासी अस्तित्व और संस्कृति की रक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 342 में आवश्यक बदलाव किए जाने चाहिए।
चंपाई सोरेन ने कहा कि यदि धर्मांतरण को नहीं रोका गया, तो भविष्य में सरना स्थल, जाहेरस्थान और देशाउली जैसी आदिवासी आस्था स्थलों की परंपराएं कमजोर पड़ सकती हैं।
राजनीतिक हलकों में बढ़ी चर्चा

फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है।

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